Tarpan Karte Samay Dakshin Disha : पितृ पक्ष में तर्पण करते समय कई नियमों का पालन किया जाता है। इन्हीं में एक प्रमुख नियम दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों को जल अर्पित करने का है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर तर्पण के लिए दक्षिण दिशा ही क्यों चुनी जाती है? क्या इसका पितरों से कोई खास संबंध है और तर्पण करते समय दिशा का ध्यान रखना क्यों जरूरी माना जाता है? आइए जानते हैं।
हिंदू धार्मिक मान्यताओं में अलग-अलग दिशाओं को अलग देवी-देवताओं और शक्तियों से जोड़कर देखा जाता है। दक्षिण दिशा का संबंध यमराज और पितरों से माना गया है। इसी वजह से श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे पितृ कर्मों में दक्षिण दिशा को विशेष महत्व दिया जाता है।
धार्मिक परंपरा के अनुसार पितरों का स्मरण करते हुए दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल अर्पित किया जाता है। मान्यता है कि इस दिशा में किया गया तर्पण पितरों के निमित्त होता है।
तर्पण के जल में आमतौर पर काले तिल और कुश का इस्तेमाल भी किया जाता है। इस दौरान पूर्वज का नाम और गोत्र लेकर श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करने की परंपरा है।
यही बात अक्सर लोगों को उलझन में डालती है। सामान्य पूजा-पाठ में पूर्व या उत्तर दिशा को महत्व दिया जाता है, जबकि पितृ कर्म में दक्षिण दिशा का विशेष स्थान है। इसका कारण धार्मिक परंपराओं में दक्षिण दिशा को पितरों और यम से जोड़ा जाना बताया जाता है।इसलिए देव कार्य और पितृ कार्य की विधियों में दिशा को लेकर अंतर देखने को मिलता है।
अगर जानकारी के अभाव में दिशा को लेकर गलती हो जाए तो इसे लेकर डरने की जरूरत नहीं है। श्राद्ध और तर्पण की विधियां अलग-अलग कुल और क्षेत्रों में कुछ भिन्न भी हो सकती हैं।
ऐसी स्थिति में अपने परिवार की परंपरा के अनुसार विधि जानकर आगे का तर्पण किया जा सकता है। पितृ पक्ष का मूल उद्देश्य पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करना और उनके निमित्त तर्पण, दान तथा श्राद्ध करना माना गया है।