Pitru Paksha Religious Beliefs : पूर्वजों और पितरों को समर्पित पितृपक्ष की शुरुआत हो गई हैं। 16 दिनों पूर्वजों यानी पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त की जाती हैं। पितृ पक्ष के दौरान हिन्दू परिवार के लोग अपने दिवंगत पूर्वजों और प्रियजनों की आत्मिक शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान आदि करने के लिए तांबा अथवा कांसे के बर्तनों का प्रयोग करते हैं।
ना कि लोहे के बर्तनों का इस्तेमाल करते हैं। श्राद्ध और पूजा-पाठ में लोहे के बर्तनों का इस्तेमाल अशुभ माना गया है क्योंकि धार्मिक मान्यताओं में लोहे को अशुद्ध और निम्न धातु माना जाता हैं। आइए जानते है पितृ पूजा में लोहे के बर्तनों का प्रयोग क्यों माना जाता है वर्जित?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, किसी भी पूजा- पाठ में लोहे के बर्तनों का प्रयोग नहीं होता है। चाहे पितृ पूजा क्यों न हो। धार्मिक मान्यताओं में लोहे को अशुद्ध और निम्न धातु माना जाता हैं। इसमें जल्दी जंग लग जाती है और यह शनि व राहु ग्रह से प्रभावित माना जाता है। इसे नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करने वाला माना गया है।
पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों में केवल सोना, चांदी, तांबा, पीतल और कांसा जैसी पवित्र और प्राकृतिक धातुओं को ही शुभ और योग्य माना गया है। ऐसे में इस दौरान लोहे के बर्तनों का प्रयोग नहीं होता है।
श्राद्ध कर्म में लोहे या स्टील का पात्र देखने मात्र से पितर नाराज होकर लौट जाते हैं, ऐसा शास्त्रों में उल्लेख है।
व्यवहारिक दृष्टि से देखें तो तांबा एवं कांसा उत्तम धातु इसलिए माना गया है क्योंकि मनुष्य ने इस धातु की खोज सबसे पहले की थी। धार्मिक कार्यों में इनका प्रयोग किया जाने लगा था। लोहे की खोज बाद में हुई तब तक समाज में तांबा और कांसा शुद्घ धातु के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुका था और लोग इसे पारंपरिक तौर पर प्रयोग करने लगे थे।