Pitru Paksha Shopping: पितृपक्ष की शुरुआत हो गई हैं। यह समय पूर्वजों के स्मरण, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए जाना जाता है। इस दौरान शुभ कार्य करने से परहेज किया जाता हैं। खासतौर पर, मकान की रजिस्ट्री,नई गाड़ी की डिलीवरी और खरीददारी नवरात्रि तक टाल देते हैं।
लोक मान्यताओं के अनुसार, इन 16 दिनों में कुछ भी नया खरीदना 'अशुभ' होता है और इससे पितृ दोष लगता हैं। क्या सचमुच धार्मिक ग्रंथों में ऐसा कोई नियम लिखा है, या यह सिर्फ पीढ़ियों से चला आ रहा एक डर है?
सनातन हिन्दू परंपरा में पितृपक्ष को कभी ‘अशुभ’ काल नहीं कहा गया। धर्मग्रथों में यह समय पूर्वजों के प्रति आभार जताने और संयम बरतने का पर्व हैं। कोई भी माता-पिता या पूर्वज अपनी संतान को तरक्की करते, नया घर बनाते या वाहन खरीदते देखकर नाराज नहीं होते हैं।
शास्त्रों का सीधा तर्क है कि संतानों की सुख-समृद्धि से पितरों की आत्मा तृप्त होती है,न कि कुपित हैं। सच्चाई यह है कि गरुड़ पुराण, मनुस्मृति या किसी भी अन्य धर्मग्रंथ में पितृपक्ष के दौरान जरूरत की चीजें खरीदने की कोई मनाही नहीं हैं।
शास्त्रों ने विवाह, मुंडन, सगाई और गृहप्रवेश जैसे बड़े आयोजनों को पितृपक्ष में रोकने को कहा था। वजह साफ थी, इनमें ढोल-नगाड़े, नाच-गाना और उत्सव होता है, जो पितरों के स्मरण के गंभीर माहौल से मेल नहीं खाता। धीरे-धीरे लोगों ने इस रोक को सामान्य बाजार की खरीदारी से भी जोड़ दिया।
पुराने समय में ऋषियों ने यह नियम इसलिए बनाया ताकि 16 दिन लोग विलासिता और मौज-मस्ती छोड़कर सिर्फ अपने पूर्वजों के तर्पण, ध्यान और सेवा पर फोकस कर सकें।
ज्योतिष नियमों के अनुसार, कई चीजें ऐसी हैं जिन्हें इस दौरान लेना बेहद शुभ फल देता है:
ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार, तर्पण और श्राद्ध कर्म में चांदी के बर्तनों का इस्तेमाल सबसे उत्तम माना गया है। इस दौरान चांदी या सोने की खरीदारी पितरों के आशीर्वाद के समान मानी जाती है।
ज्योतिष शास्त्र में पितृपक्ष के दौरान प्रॉपर्टी बुक करना या रजिस्ट्री कराना पूरी तरह शुभ माना गया है। बस गृहप्रवेश नवरात्रि में करनी चाहिए ।
नए वस्त्र, छाता, बर्तन और अनाज खरीदकर जरूरतमंदों को देना इन 16 दिनों का सबसे बड़ा पुण्य कर्म हैं।
यदि आप गाड़ी, लैपटॉप, जमीन या कोई जरूरी वस्तु खरीद रहे हैं, तो एक छोटी-सी बात का ध्यान रखें। सामान घर लाने के बाद मन ही मन अपने पितरों का स्मरण करें और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें। आप मन में कह सकते हैं, “यह सब आपके आशीर्वाद का ही फल है।” इसके बाद नई वस्तु को भगवान के सामने रखकर प्रणाम करें और किसी जरूरतमंद या भूखे व्यक्ति को भोजन कराएं।
पितृपक्ष भय का नहीं, बल्कि श्रद्धा और भाव का समय माना जाता है। केवल अंधविश्वास के कारण जरूरी काम रोकने की आवश्यकता नहीं है। धार्मिक मान्यताओं को समझते समय श्रद्धा के साथ विवेक का भी ध्यान रखना चाहिए।