मनोरथ द्वितीया व्रत (फोटो.सोशल मीडिया) 
धर्म

Manorath Dwitiya Vrat 2026: भगवान कृष्ण को समर्पित व्रत से पूरी होती हैं मनोकामनाएं, जानें पूजा विधि और महत्व

Manorath Dwitiya Vrat: आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर मनाया जाने वाला मनोरथ द्वितीया व्रत 16 जुलाई को है। आइए जानते हैं भगवान कृष्ण को समर्पित इस व्रत की पूजा विधि।

रीता राय सागर

Manorath Dwitiya Vrat 2026 Date And Puja Vidhi: मनोरथ द्वितीय व्रत आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष के दूसरे दिन मनाया जाता है। मनोरथ द्वितीय व्रत 2026 की तिथि 16 जुलाई को है। इसी दिन विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा का आयोजन होता है।

कृष्ण भगवान को समर्पित मनोरथ द्वितीया व्रत को मुख्य रूप से भारत के पश्चिमी भागों, जैसे गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान में मनाया जाता है। यह व्रत आषाढ़ माह (जून-जुलाई) के शुक्ल पक्ष के दूसरे दिन मनाया जाता है। यह व्रत भगवान विष्णु के अवतार भगवान कृष्ण को समर्पित है और इस दिन भक्त अपनी मनोकामनाएं या मनोरथ भगवान के समक्ष रखते हैं। इसके पीछे मान्यता यह होती है कि सच्ची भक्ति और प्रार्थना के माध्यम से उनकी मनोकामनाएं पूरी होंगी।

मनोरथ द्वितीया व्रत का महत्व

मनोरथ शब्द का अर्थ है गहरी इच्छा या मनोकामना और भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इस व्रत को करते हैं। ऐसा माना जाता है कि सच्ची श्रद्धा और पवित्र हृदय से व्रत रखने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उन्हें जीवन में सुख, समृद्धि और शांति प्राप्त होती है।

इस व्रत का आधुनिक महत्व आस्था, आंतरिक शक्ति और सकारात्मक सोच की शक्ति में निहित है। कई लोग मानते हैं कि उपवास और प्रार्थना करने से अनुशासन, धैर्य और कृतज्ञता की भावना विकसित होती है।

मनोरथ द्वितीया व्रत की पूजा विधि

  • तैयारी 

श्रद्धालु सुबह जल्दी उठते हैं, स्नान करते हैं और साफ कपड़े पहनते हैं। घर और पूजा स्थल की सफाई की जाती है। घर को फूलों और रंगोली से सजाया जाता है।

  • उपवास

इस दिन श्रद्धालु कठोर उपवास रखते हैं। कुछ श्रद्धालु भोजन या पानी का सेवन किए बिना निर्जला व्रत रखते हैं, पूर्ण उपवास जबकि अन्य फल, दूध और पानी का सेवन करके फलाहार व्रत करते हैं।

  • पूजा एवं अर्पण

मुख्य अनुष्ठान में भगवान कृष्ण की पूजा शामिल है। वेदी पर कृष्ण की एक छोटी सी मूर्ति या चित्र स्थापित की जाती है। इसके बाद भगवान विष्णु और कृष्ण को समर्पित मंत्रों जैसे कि विष्णु सहस्रनाम या कृष्ण अष्टकम, के उच्चारण के साथ पूजा की जाती है।

  • नैवेद्य

भक्त भगवान को फल, मिठाई, तुलसी के पत्ते, मक्खन और दही अर्पित करते हैं, क्योंकि ये भगवान कृष्ण के प्रिय माने जाते हैं।

  • आरती

पूजा का समापन आरती के साथ होता है, जिसमें भक्ति गीत गाते हुए देवता के सामने एक जलते हुए दीपक को गोलाकार गति में घुमाया जाता है।

  • पाठ करना

भक्त भगवद् गीता , भगवद् पुराण या भगवान कृष्ण के जीवन और शिक्षाओं का वर्णन करने वाले अन्य पवित्र ग्रंथों का पाठ करते हैं।

  • दान और परोपकार

जरूरतमंदों को भिक्षा देना, ब्राह्मणों को भोजन कराना और कपड़े, भोजन या धन दान करना इस दिन अत्यंत शुभ माना जाता है।

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