Hartalika Teej 2026: हरतालिका तीज का व्रत महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए करती हैं। इस दौरान भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा होती है। तीज का व्रत माता पार्वती और भगवान शिव के अटूट प्रेम और समर्पण को दर्शाता है।
कहा जाता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसी तपस्या और व्रत के प्रभाव से उन्हें मनचाहा वर प्राप्त हुआ। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हरतालिका तीज का व्रत रखा जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन का आशीष मांगती है।
पौराणिक कथा के अनुसार, एक दिन माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा कि सभी व्रतों में सबसे श्रेष्ठ व्रत कौन-सा है। तब भगवान शिव ने उन्हें हरतालिका व्रत की कथा सुनाई। भगवान शिव ने बताया कि पूर्व जन्म में माता पार्वती ने उन्हें पति रूप में पाने के लिए बहुत कठोर तपस्या की थी। उन्होंने 64 वर्षों तक केवल पेड़ों के सूखे पत्ते खाकर अपना जीवन बिताया। कड़ाके की ठंड, तेज धूप और बारिश में भी माता पार्वती ने अपनी तपस्या जारी रखी।
माता पार्वती को कठोर तपस्या करते हुए देखकर उनके पिता हिमालय बहुत चिंतित हुए। तभी एक दिन नारद मुनि वहां पहुंचे। उन्होंने हिमालय से कहा कि उनकी बेटी के लिए भगवान विष्णु योग्य वर हैं और उनसे पार्वती का विवाह कर देना चाहिए। हिमालय ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। जब यह बात माता पार्वती को पता चली तो वह बेहद दुखी हुई, क्योंकि उनके मन में भगवान शिव को पति के रूप में पाने का संकल्प था।
माता पार्वती ने अपनी सहेली को पूरी बात बताई। सहेली ने उनकी इच्छा पूरी करने में मदद की और उन्हें एक घने जंगल में ले गई। वहां एक गुफा और नदी के किनारे माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए तपस्या शुरू की। भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन उन्होंने भगवान शिव और माता पार्वती के स्वरूप की स्थापना की और पूजा प्रारंभ की। उन्होंने पूरी रात जागकर भगवान शिव का ध्यान किया।
माता पार्वती की कठोर तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए। उन्होंने माता पार्वती को दर्शन दिए और उनसे वरदान मांगने को कहा। माता पार्वती ने कहा कि वह भगवान शिव को ही अपने पति के रूप में चाहती हैं और उनकी कोई दूसरी इच्छा नहीं है। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनकी इच्छा स्वीकार कर ली।
इसके बाद माता पार्वती ने अगले दिन व्रत का पारण किया। जब उनके पिता हिमालय उन्हें ढुंढते हुए वहां पहुंचे तो उन्होंने अपनी पूरी बात उन्हें बताई। बाद में हिमालय ने माता पार्वती का विवाह भगवान शिव से कराने का वचन दिया।
माता पार्वती की सहेली उन्हें उनके पिता के निर्णय से बचाने के लिए जंगल में ले गई थी। इसी वजह से इस व्रत का नाम हरतालिका पड़ा। 'हरत' का संबंध हरण या ले जाने से और 'आलिका' का अर्थ सखी या सहेली होता है।
इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की बालू या मिट्टी से प्रतिमा बनाते हैं और फिर महिलाएं पूजा-अर्चना करती हैं, हरतालिका तीज की कथा सुनती हैं और रात में जागरण करती हैं। हरतालिका तीज की कथा का मुख्य संदेश माता पार्वती की भक्ति, समर्पण और अपनी इच्छा के प्रति अटूट विश्वास को दिखाता है। आज भी महिलाएं इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती से सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करती हैं।