भगवान गणेश (सौ.सोशल मीडिया)  
धर्म

आज द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर अवश्य पढ़ें ये कथा, जीवन की हर मुश्किल होगी दूर

Ganpati Vrat Katha: शास्त्रों में बताया गया है कि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिन पूजा के समय कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। क्योंकि बिना कथा का पाठ किए व्रत पूरा नहीं होता है।

सीमा कुमारी

Dwijapriya Sankashti Chaturthi Vrat Katha: आज 5 फरवरी 2026 को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी मनाई जा रही है। हिन्दू धर्म में इस व्रत का बड़ा महत्व है। यह व्रत हर साल फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन रखा जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर पूजा और व्रत करने से विघ्नहर्ता भगवान गणेश जीवन के सभी दुखों को दूर करते है। यही नहीं संतान को सफलता आशीर्वाद भी प्रदान करते है।

शास्त्रों में बताया गया है कि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिन पूजा के समय कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। क्योंकि बिना कथा का पाठ किए व्रत पूरा नहीं होता है। मान्यता है कि कथा का पाठ करने से जीवन की हर बाधा दूर होती है।

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी की कथा

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन इनमें से एक कथा को सबसे अधिक प्रसिद्ध माना जाता है। इस कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती चौपड़ का खेल खेल रहे थे। उस समय वहां कोई भी ऐसा नहीं था, जिसे खेल का निर्णायक बनाया जा सके।

तब भगवान शिव और माता पार्वती ने मिट्टी से एक प्रतिमा बनाई और अपनी दिव्य शक्ति से उसे सजीव कर दिया। इसके बाद उस बालक को खेल का निर्णायक नियुक्त किया गया। खेल पुनः आरंभ हुआ। हर बार माता पार्वती भगवान शिव को पराजित कर रही थीं, लेकिन एक बार बालक ने भूलवश भगवान शिव को विजयी घोषित कर दिया।

बालक की इस गलती से माता पार्वती अत्यंत क्रोधित हो गईं और उन्होंने क्रोध में आकर बालक को लंगड़ा होने का श्राप दे दिया। इसके बाद बालक ने अपनी भूल स्वीकार करते हुए माता पार्वती से क्षमा याचना की। तब माता ने कहा कि दिया गया श्राप वापस नहीं लिया जा सकता।

इसके पश्चात बालक ने माता पार्वती से श्राप से मुक्ति का उपाय पूछा। तब माता पार्वती ने उसे बताया कि यदि वह फाल्गुन माह की संकष्टी चतुर्थी के दिन सच्चे मन से भगवान गणेश की पूजा करे और व्रत रखे, तो वह श्राप से मुक्त हो सकता है।

बालक ने माता पार्वती के बताए अनुसार श्रद्धा और भक्ति के साथ द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा और भगवान गणपति की पूजा की। भगवान गणेश की कृपा से वह बालक पूर्णतः स्वस्थ हो गया और श्राप से मुक्त हो गया।

यह कथा बताती है कि सच्चे मन से किया गया गणेश व्रत सभी कष्टों, दोषों और बाधाओं से मुक्ति दिलाने वाला होता है।

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