Baglamukhi Maa Kaun Hai : मां बगलामुखी का जन्मोत्सव 24 अप्रैल, शुक्रवार को मनाया जा रहा है। सनातन धर्म में मां बगलामुखी का विशेष महत्व है। दसों महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या के रूप में पूजी जाने वाली मां बगलामुखी को पीतांबरा भी कहा जाता है।
धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि, मां बगलामुखी की उपासना से न केवल शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है, बल्कि जीवन में आने वाले बड़े से बड़े तूफान भी थम जाते है। इसलिए सनातन धर्म में मां बगलामुखी का बड़ा महत्व है।
शास्त्रों के अनुसार, बगलामुखी को पीतांबरा देवी भी कहा जाता है, क्योंकि उनका स्वरूप पीले वस्त्रों और पीले आभूषणों से सुसज्जित होता है।
धार्मिक मान्यता है कि, वे अपने भक्तों के शत्रुओं की वाणी, बुद्धि और शक्ति को निष्क्रिय कर देती है। इसलिए न्याय, विजय और सुरक्षा की कामना करने वाले भक्त विशेष रूप से उनकी आराधना करते है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, देवी बगलामुखी साधकों को न केवल बाहरी शत्रुओं से बचाती हैं, बल्कि भीतर के भय, भ्रम और नकारात्मकता को भी शांत करती है। यही कारण है कि तंत्र साधना में भी उनका विशेष स्थान माना गया है।
बगलामुखी जयंती के दिन विशेष रूप से मां बगलामुखी की पूजा-अर्चना, मंत्र जाप और हवन किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन की गई साधना कई गुना फल देती है। खासतौर पर शत्रु बाधा, कोर्ट-कचहरी के मामले, मानसिक अशांति और भय से मुक्ति के लिए यह दिन बहुत ही शुभ माना जाता है। भक्त इस दिन पीले वस्त्र धारण कर, पीले फूल और हल्दी से देवी की पूजा करते है।
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पौराणिक कथा के अनुसार, सतयुग में एक बार भयंकर तूफान और प्राकृतिक आपदाओं ने पूरी पृथ्वी को संकट में डाल दिया था। चारों ओर तबाही का दृश्य था और सृष्टि का अस्तित्व खतरे में पड़ गया था। ऐसे समय में भगवान विष्णु समाधान की खोज में भगवान शिव की शरण में पहुंचे।
भगवान शिव ने उन्हें बताया कि इस विनाश से केवल आदिशक्ति ही रक्षा कर सकती हैं। इसके बाद भगवान विष्णु ने कठोर तपस्या कर आदिशक्ति को प्रसन्न किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति हरिद्रा झील से बगलामुखी स्वरूप में प्रकट हुईं। उनके प्राकट्य के साथ ही भयंकर तूफान शांत हो गया और सृष्टि का संतुलन फिर से स्थापित हो गया। तभी से देवी बगलामुखी को संकट और विनाश को शांत करने वाली शक्ति के रूप में पूजा जाता है।