सर सैयद अहमद खान फोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
17 अक्टूबर को देश उस शिक्षाविद को याद करता है, जिसने 19वीं सदी में आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा की अलख जगाई। उनकी 209वीं जयंती पर तस्वीरों में देखिए उनका जीवन, अलीगढ़ आंदोलन और वह विरासत, जो आज अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप में खड़ी है।सर सैयद अहमद खान का जन्म 17 अक्टूबर 1817 को दिल्ली में हुआ। उनका परिवार प्रतिष्ठित था और उसके मुग़ल दरबार से गहरे संबंध माने जाते हैं। पिता मीर मुत्तकी और माँ अजीज़ुन्निसा थीं। बताया जाता है कि बचपन की पढ़ाई और संस्कार गढ़ने में माँ की बड़ी भूमिका रही।उन्होंने घर पर ही कुरान, फारसी, अरबी और गणित जैसे विषय पढ़े। पिता के निधन के बाद 1838 में उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में कदम रखा। आगे चलकर वे न्यायिक सेवा में अलग-अलग शहरों में तैनात रहे और 1876 में सेवानिवृत्त हुए। इस दौरान उन्होंने प्रशासन और समाज को करीब से समझा।1847 में उन्होंने "आसार-उस-सनादीद" लिखी, जिसमें दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतों, उनके इतिहास और स्थापत्य का विस्तृत वर्णन है। यह किताब उनकी शोध-दृष्टि और इतिहास के प्रति लगाव का प्रमाण मानी जाती है। इसे आज भी दिल्ली के स्मारकों को समझने का अहम स्रोत माना जाता है।1857 के विद्रोह ने उनके मन पर गहरा असर डाला। उन्होंने इसके कारणों की पड़ताल करते हुए "असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिंद" जैसी रचना लिखी। इसके बाद उन्हें लगा कि समाज की तरक्की का सबसे मजबूत रास्ता आधुनिक शिक्षा, ज्ञान और विज्ञान को अपनाना है।1864 में गजीपुर में उन्होंने साइंटिफिक सोसाइटी की स्थापना की। इसका मकसद अंग्रेजी और यूरोपीय भाषाओं की उपयोगी वैज्ञानिक और ऐतिहासिक किताबों का उर्दू में अनुवाद कराना था, ताकि आम पाठक तक नया ज्ञान पहुँचे। 1867 में अलीगढ़ आने के बाद सोसाइटी का काम भी यहीं आगे बढ़ा।1869 से 1870 के बीच सर सैयद इंग्लैंड गए। वहाँ ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज जैसे विश्वविद्यालयों की शिक्षा-व्यवस्था देखकर वे बेहद प्रभावित हुए। यहीं उनके मन में भारत में ऐसा ही शिक्षण संस्थान बनाने का सपना पक्का हुआ। उसी दौरान उन्होंने "खुतबात-ए-अहमदिया" भी लिखी।1870 में उन्होंने पत्रिका "तहजीबुल अख़लाक़" शुरू की। इसके जरिए उन्होंने समाज में सुधार, तर्क और विज्ञान की सोच अपनाने और अंधविश्वास छोड़ने की बात रखी। वे चाहते थे कि लोग सवाल पूछें, पढ़ें और बदलते दौर के साथ आगे बढ़ें।24 मई 1875 को अलीगढ़ में मदरसतुल उलूम मुसलमानान-ए-हिंद की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल (MAO) कॉलेज बना। 8 जनवरी 1877 को कॉलेज की आधारशिला रखी गई। यहाँ धार्मिक शिक्षा के साथ अंग्रेजी, विज्ञान और आधुनिक विषय पढ़ाने पर जोर दिया गया।सर सैयद के नेतृत्व में शुरू हुए इस शैक्षिक और सामाजिक आंदोलन को अलीगढ़ आंदोलन कहा जाता है। इसका मूल विचार था कि आधुनिक शिक्षा, तर्क और विज्ञान से ही समाज आगे बढ़ सकता है। 1886 में उन्होंने मुहम्मडन एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस शुरू की, जिसने शिक्षा के प्रसार के लिए देशभर में लोगों को जोड़ा। 1878 में वे वायसराय की विधान परिषद के सदस्य भी बने।27 मार्च 1898 को अलीगढ़ में उनका निधन हो गया। 1888 में उन्हें "सर" की उपाधि मिली थी और वे आज भी इसी नाम से जाने जाते हैं। उनके देहांत के बाद 1920 में MAO कॉलेज अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना। आज यह संस्थान देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में गिना जाता है और हजारों विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा देता है।