भारत की वीरांगनाएँ डिजाइन फोटो
भारत का इतिहास सिर्फ़ राजाओं और सेनापतियों का नहीं, उन वीरांगनाओं का भी है जिन्होंने 16वीं सदी से 20वीं सदी तक अपने राज्य, अपनी माटी और आजादी के लिए सब कुछ दाँव पर लगाया। रानी अब्बक्का से लेकर कैप्टन लक्ष्मी सहगल तक, देखिए 10 ऐसी वीरांगनाएँ, जिनकी गाथा आज भी हिम्मत जगाती है।कर्नाटक के तटीय क्षेत्र उल्लाल की रानी अब्बक्का ने 16वीं सदी में पुर्तगालियों के विस्तार का डटकर सामना किया। माना जाता है कि वे कई वर्षों तक उन्हें अपने राज्य से दूर रखने में सफल रहीं। लोक-कथाओं में उनके आग बरसाने वाले बाणों का भी जिक्र मिलता है। उन्हें कर्नाटक में आज भी "अभया रानी" के नाम से याद किया जाता है।5 अक्टूबर 1524 को कालिंजर में जन्मीं दुर्गावती का विवाह गोंड राजा दलपत शाह से हुआ। पति के निधन के बाद उन्होंने अपने बेटे वीर नारायण की ओर से गोंडवाना का शासन सँभाला। 1564 में मुगल सेनापति आसफ खान के हमले के समय उन्होंने युद्ध लड़ा और 24 जून 1564 को पकड़े जाने से पहले ही अपने प्राण त्याग दिए। इस दिन को "बलिदान दिवस" के रूप में याद किया जाता है।शिवगंगा (तमिलनाडु) की रानी वेलु नचियार को अंग्रेजों से लड़ने वाली शुरुआती रानियों में गिना जाता है। 1772 में पति की मृत्यु के बाद वे बेटी के साथ बच निकलीं और कई साल मैसूर के हैदर अली के संरक्षण में रहीं। उसकी मदद और अपनी सेना के साथ उन्होंने 1780 में शिवगंगा वापस जीत लिया। कहा जाता है कि उनकी सेनापति कुयिली ने अंग्रेजों के शस्त्रागार को नष्ट करने के लिए आत्म-बलिदान दिया।23 अक्टूबर 1778 को जन्मीं चेन्नम्मा कर्नाटक के कित्तूर की रानी बनीं। राजा और बेटे के निधन के बाद उन्होंने गोद लिए उत्तराधिकारी को मान्यता दिलाने के लिए अंग्रेजों से संघर्ष किया। अक्टूबर 1824 की पहली लड़ाई में कित्तूर की सेना ने अंग्रेज अफसर थैकरे को मार गिराया। बाद में अंग्रेजों की बड़ी सेना के आगे वे बंदी बनीं और 1829 में कैद में ही उनका निधन हुआ। संसद परिसर में उनकी प्रतिमा लगी है।झाँसी की रानी का जन्म 1828 के आसपास वाराणसी में हुआ। राजा गंगाधर राव के निधन के बाद अंग्रेजों ने उनके दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया और झाँसी को अपने राज्य में मिला लिया। कहा जाता है कि तब रानी ने "मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी" जैसा संकल्प दोहराया। 1858 में झाँसी की घेराबंदी के बाद वे कालपी और ग्वालियर पहुँचीं और 18 जून 1858 को युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुईं।नवाब वाजिद अली शाह को अंग्रेजों द्वारा कलकत्ता भेजे जाने के बाद उनकी बेगम हजरत महल ने 1857 में लखनऊ की कमान सँभाली और अपने बेटे बिरजिस कद्र को अवध का नवाब घोषित करवाया। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ सेना संगठित की। लखनऊ के पतन के बाद वे नेपाल चली गईं और 1879 में वहीं उनका निधन हुआ। कहा जाता है कि उन्होंने अंग्रेजों के प्रलोभन ठुकरा दिए थे।मध्य प्रदेश के मंडला जिले की रामगढ़ रियासत की रानी अवंतीबाई ने 1857 में अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा खोला। पति के निधन के बाद अंग्रेजों ने उनकी रियासत पर कब्जा करने की कोशिश की, तब उन्होंने सेना जुटाई और आसपास के राजाओं से भी सहयोग माँगा। 20 मार्च 1858 को अंग्रेज सेना से घिर जाने पर उन्होंने कैद से बेहतर वीरगति चुनी। भारत सरकार ने उन पर डाक टिकट भी जारी किया है।26 जनवरी 1915 को मणिपुर के तामेंगलोंग जिले में जन्मीं गाइदिन्ल्यू ने मात्र 13 वर्ष की उम्र में अपने चचेरे भाई हाइपौ जादोनांग के हेराका आंदोलन से जुड़कर अंग्रेजी शासन का विरोध किया। जादोनांग को फाँसी के बाद उन्होंने नेतृत्व सँभाला। 1932 में गिरफ्तारी के बाद वे लगभग 14 साल जेल में रहीं और 1947 में रिहा हुईं। जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें "रानी" की उपाधि दी और उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।बंगाल के मिदनापुर की मातंगिनी हाजरा पति की मृत्यु के बाद गांधीजी के आंदोलनों से जुड़ीं और नमक सत्याग्रह में भी हिस्सा लिया। 29 सितंबर 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 73 वर्ष की उम्र में उन्होंने तामलुक थाने की ओर जुलूस का नेतृत्व किया। पुलिस की गोली लगने पर भी हाथ में तिरंगा थामे "वंदे मातरम्" बोलती रहीं। उनकी शहादत आज भी बंगाल और देश में याद की जाती है।24 अक्टूबर 1914 को मद्रास (अब चेन्नई) में जन्मीं लक्ष्मी स्वामीनाथन पेशे से डॉक्टर थीं। सिंगापुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस से मुलाकात के बाद उन्होंने आजाद हिंद फौज की महिला "रानी झाँसी रेजिमेंट" की कमान सँभाली और आजाद हिंद सरकार में महिला विभाग की मंत्री भी रहीं। बर्मा में 1945 में उन्हें अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया। बाद में उन्हें पद्म विभूषण मिला। 2012 में उनका निधन हुआ। इन वीरांगनाओं की कहानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि साहस की कोई उम्र या सीमा नहीं होती।