Yavatmal District Soybean Seed Germination Failure: यवतमाल तहसील के तलेगांव निवासी किसान अमोल मोहुर्ले ने खराब सोयाबीन बीज को लेकर शिकायत करने के बावजूद न्याय नहीं मिलने का आरोप लगाते हुए जिला कृषि अधीक्षक कार्यालय (DSAO) में अपनी व्यथा सुनाई। अधिकारियों से संतोषजनक जवाब नहीं मिलने से परेशान किसान कार्यालय में ही फूट-फूटकर रो पड़ा। जानकारी के अनुसार, अमोल मोहुर्ले ने यवतमाल शहर के मेटीखेड़ा कृषि सेवा केंद्र से विगर कंपनी का 'मालविका' किस्म का सोयाबीन बीज खरीदा था।
बुवाई के बाद बीज का अपेक्षित अंकुरण नहीं होने पर उन्होंने यवतमाल तहसील कृषि अधिकारी कार्यालय में इसकी आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद कृषि विभाग की टीम ने खेत का निरीक्षण कर पंचनामा किया। किसान मोहुर्ले का आरोप है कि पंचनामा करते समय संबंधित अधिकारियों ने जबरदस्ती उनसे हस्ताक्षर करवा लिए और पंचनामा पढ़ने का अवसर भी नहीं दिया गया।
पंचनामे में खेत में 50 प्रतिशत अंकुरण होने की जानकारी दर्ज की गई, जिस पर उन्होंने आपत्ति जताई। इसके बाद किसान ने जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर जिलाधिकारी श्री विकास मीणा से मुलाकात की। जिलाधिकारी के निर्देश के बाद दोबारा पंचनामा किया गया। हालांकि, दूसरे पंचनामे से भी संतुष्ट नहीं होने पर उन्होंने जिला कृषि अधीक्षक कार्यालय का रुख किया। कार्यालय में मौजूद रहने के दौरान उनकी मुलाकात किसान आंदोलन से जुड़े प्रो. पंढरी पाठे और उनके सहयोगियों से हुई।
इस दौरान जिला कृषि अधीक्षक मनोज ढगे से संपर्क करने के लिए 13 बार फोन किया गया, लेकिन उन्होंने एक बार भी फोन नहीं उठाया, ऐसा आरोप लगाया गया। किसान दोपहर 2 बजे से शाम 7.30 बजे तक न्याय की उम्मीद में कार्यालय में इंतजार करता रहा, लेकिन अधिकारी के उपस्थित नहीं होने से उसकी निराशा और बढ़ गई।
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इस दौरान कृषि उपसंचालक सांगले और मौजूद कर्मचारियों से चर्चा की गई। मोहुर्ले ने दूसरे पंचनामे के लिए आए क्वालिटी कंट्रोल अधिकारी का नाम, मोबाइल नंबर और पंचनामा किस प्रक्रिया से किया गया, इसकी जानकारी मांगी। लेकिन जिला कृषि अधीक्षक कार्यालय के किसी भी अधिकारी या कर्मचारी ने संतोषजनक जानकारी नहीं दी, ऐसा आरोप लगाया गया।
इस पूरे घटनाक्रम से किसान अमोल मोहुर्ले मानसिक तनाव में आ गए। उनके द्वारा 'मैं कीटनाशक पीकर अपनी जान दे दूंगा' जैसी बात कहने की जानकारी सामने आई है। इसके बाद किसान आंदोलन के सचिन मनवर, गौरीनंदन कन्नाके, कृष्णा पुसनाके, विकास मनवर और रामराव राठौड़ ने उन्हें समझाया और हिम्मत दी। बाद में उन्हें सुरक्षित घर भेजा गया।