मराठी सिनेमा और पारंपरिक लावणी की प्रसिद्ध कलाकार मधु कांबीकर का 73 वर्ष की आयु में निधन हो गया।
मधु कांबीकर ने अपनी कला और मधुप्रीतम संस्था के जरिए पारंपरिक लावणी को जीवित रखा।
मराठी के अलावा हिंदी और गुजराती सिनेमा, नाटकों और दूरदर्शन के कई धारावाहिकों में अपनी छाप छोड़ी।
Marathi Actress and Lavani Artist Madhu Kambikar Journey: मराठी फिल्म जगत, रंगमंच और लोककला की वरिष्ठ अभिनेत्री एवं लावणी कलाकार मधु कांबीकर का सोमवार सुबह करीब सात बजे पुणे के येरवडा स्थित शास्त्रीनगर में उनके निवास पर निधन हो गया। वह 73 वर्ष की थीं। उनके निधन से मराठी मनोरंजन जगत में शोक की लहर है। उन्होंने फिल्मों, नाटकों, लोकनाट्यों और पारंपरिक लावणी के माध्यम से अपनी अलग पहचान बनाई थी।
मधु कांबीकर के पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए सोमवार शाम चार बजे तक शास्त्रीनगर, येरवडा स्थित उनके निवास पर रखा जाएगा। इसके बाद शाम पांच बजे उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। उनके निधन की जानकारी उनके मुंहबोले भाई और शाहिर दादा पासलकर ने दी।
वर्ष 2016 में मराठी रंगमंच से जुड़े एक कार्यक्रम में नृत्य प्रस्तुति के दौरान मधु कांबीकर को अचानक चक्कर आया और वह गिर पड़ी थीं। इसके बाद उनके मस्तिष्क की सर्जरी की गई। हालांकि, उनकी सेहत में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। पिछले कई वर्षों से वह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही थीं।
मधु कांबीकर ने अपने अभिनय करियर में गंभीर, भावनात्मक और हास्यप्रधान भूमिकाएं निभाकर दर्शकों के बीच खास जगह बनाई। निर्देशक राजदत्त की फिल्म शापित से उन्हें विशेष पहचान मिली। इसके बाद उन्होंने राघू मैना, हेच माझं माहेर, एक होता विदूषक, रावसाहेब, झपाटलेला, झपाटलेला 2, स्त्री जन्मा ही तुझी कहाणी, मला घेऊन चला, येऊ का घरात, बिनकामाचा नवरा, धोंडी धोंडी पाणी दे, डेबू, संत गाडगे महाराज, संघर्ष जीवनाचा और आभ्राण जैसी फिल्मों में काम किया।
एक होता विदूषक में उनकी भूमिका, झपाटलेला में लक्ष्या की मां का किरदार और डेबू में संत गाडगे महाराज की मां की भूमिका विशेष रूप से याद की जाती है। विभिन्न प्रकार के किरदारों को सहजता से निभाने की उनकी क्षमता ने उन्हें मराठी सिनेमा में अलग पहचान दिलाई।
मधु कांबीकर ने मराठी फिल्मों के अलावा हिंदी सिनेमा में भी काम किया। वह हम दोनों, सातवां आसमान, अपनापन, यशवंत और शोला और शबनम जैसी हिंदी फिल्मों में नजर आईं। गुजराती फिल्म साद में उनके अभिनय की भी सराहना हुई।
फिल्मों के साथ-साथ मधु कांबीकर ने रंगमंच पर भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। पुत्रकामेष्टी, पेइंग गेस्ट, चंद्र जिथे उगवत नाही, आकाश पेलताना, सूर राहू दे, लावणी भुलली अभंगाला, आमदार सौभाग्यवती, फुलवंती और सखी माझी लावणी जैसे नाटकों में उन्होंने अभिनय किया।
लोकनाट्य, तमाशा और पारंपरिक लावणी से भी उनका गहरा जुड़ाव था। दादू इंदुरीकर के गाढवाचं लग्न, विच्छा माझी पुरी करा और मुजरा घ्या सरकार जैसे लोकनाट्यों से भी उनका नाम जुड़ा रहा।
मधु कांबीकर के लिए लावणी केवल मंच पर प्रस्तुति देने की कला नहीं थी, बल्कि महाराष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत थी। वह इसकी पारंपरिक शैली, इतिहास और असल स्वरूप को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना चाहती थीं। मधुप्रीतम संस्था के माध्यम से सखी माझी लावणी कार्यक्रम प्रस्तुत कर उन्होंने पारंपरिक लावणी के संरक्षण और संवर्धन में योगदान दिया।
मराठी-हिंदी फिल्मों और नाटकों के अलावा उन्होंने दूरदर्शन के धारावाहिकों में भी अभिनय किया। होळी रे होळी, सर्जा राजा, वैभव, श्रावणधारा और मुक्ती जैसे धारावाहिकों के माध्यम से वह घर-घर तक पहुंचीं।
मधु कांबीकर को अभिनय के लिए महाराष्ट्र सरकार के राज्य फिल्म पुरस्कार सहित कई सम्मानों से नवाजा गया था। हेच माझं माहेर, रावसाहेब, आई तुळजाभवानी और संघर्ष जीवनाचा जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को विशेष सराहना मिली। गुजराती फिल्म साद में अभिनय के लिए भी उन्हें पुरस्कार मिला था।
प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने अभिनय के दम पर मनोरंजन जगत में विशिष्ट स्थान बनाया। सिनेमा, रंगमंच, लोकनाट्य, लावणी और टेलीविजन जैसे विविध माध्यमों में उनके योगदान को लंबे समय तक याद किया जाएगा। उनके निधन से मराठी कला और संस्कृति के क्षेत्र ने एक अनुभवी और बहुआयामी कलाकार खो दी है।
- नवभारत लाइव के लिए पुणे से समीर सय्यद की रिपोर्ट