त्र्यंबकेश्वर में दीक्षा लेने वाले नागा साधुओं को खिचड़ी या खिचड़िया नागा कहा जाता है।
नागा संन्यास की दीक्षा कुंभ स्थलों से जुड़ी कठिन धार्मिक परंपरा मानी जाती है।
बर्फानी, खूनी और राजराजेश्वरी नागा जैसे नामों के पीछे अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं बताई जाती हैं।
Trimbakeshwar Khichdi Naga Sadhus Tradition: सिंहस्थ कुंभ में सबसे ज्यादा आकर्षण के केंद्र बिंदु नागा संप्रदाय के साधु ही रहते हैं सुबह से लेकर शाम तक धूनी रमाये चिलम लगाएं चिमटा से अलख जगाते जो दे उसका भी भला जो ना दे उसका भी भला का जय घोष करते श्रद्धा आस्था के साथ चरणों में जो भी शीश झुका उसके कल्याण के लिए भगवान शिव का प्रसाद भभूति देते नागा संन्यासियों की दुनिया ही अलग है।
इनकी रहस्यमई दुनिया में तो अनेकों रहस्य छिपे हुए हैं जिनकी चर्चा बाद में अभी तो केवल नागा संन्यासियों के इतिहास के पन्नों को पलटने के बाद जो सबसे रोचक तथ्य निकाल कर आया वह यह है कि त्रंबकेश्वर में सन्यास दीक्षा के बाद नागा दीक्षा लेने वाले संन्यासियों को खिचड़ी नागा कहा जाता है।
सनातन धर्म की नागा परंपरा में दीक्षा लेने के स्थान के आधार पर साधुओं का वर्गीकरण और नामकरण किया जाता है। नासिक के त्र्यंबकेश्वर में दीक्षा लेने वाले साधुओं को 'खिचड़ी' या 'खिचड़िया' नागा साधु कहा जाता है।
यहां पर विशेष उल्लेखनीय तथ्य भी है कि सन्यास दीक्षा तो कोई भी व्यक्ति कहीं किसी भी समय किसी भी जगह ले सकता है लेकिन सन्यास दीक्षा लेने के 12 साल के बाद किसी न किसी सिंहस्थ कुंभ स्थल पर ही लोग सन्यास दीक्षा होती है जो सबसे कठिन प्रक्रिया मानी जाती है जहां पर पिंडदान से लेकर शरीर से लंगोटी तक छोड़ देना पड़ता है।
जिसका सीधा सा एक मतलब यह भी निकाला जाता है कि अब इस नश्वर शरीर का इस भौगोलिक जगत में किसी भी प्रकार की मोह माया की जरूरत नहीं है। फिलहाल यह नागा सन्यास दीक्षा प्रयागराज हरिद्वार उज्जैन और त्रंबकेश्वर में होता है
नागा संन्यासियों का नामकरण उस पवित्र क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, जलवायु और वहां की धार्मिक विशेषताओं के आधार पर तय होता है खिचड़ी नाम का कारण के विषय में नागा संन्यासी और जानकार कहते हैं कि नासिक (त्र्यंबकेश्वर) में गोदावरी का उद्गम है और यहाँ का वातावरण और साधना का नियम कुछ ऐसा है कि यहाँ दीक्षा लेने वाले साधुओं का स्वभाव बहुत ही सहज, सरल और मिलाजुला माना जाता है।
जिस तरह खिचड़ी कई अनाजों का सुपाच्य और संतुलित मिश्रण है, ठीक उसी तरह इन साधुओं का व्यवहार उग्र न होकर शांत और सर्वसमावेशी (सबके साथ घुल-मिल जाने वाला) माना जाता है।
यहां पर विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि त्रंबकेश्वर में भगवान त्र्यंबक राजा का जो स्वरूप है वह ब्रह्मा विष्णु महेश के रूप में है और एक साथ पालन करता सृष्टि रचयिता और संघार करता विराजमान है जिसके कारण त्रंबकेश्वर की पावन पवित्र भूमि और यहां का हवा पानी इन्हीं तीनों रूपों में यहां पर रहने वाले यहां पर आने वाले और यहां पर लोग संन्यास की दीक्षा लेने वालों पर दिखाई पड़ता है।
बर्फानी नागा: हरिद्वार में दीक्षा पाने वाले साधुओं को बर्फानी नागा कहा जाता है, क्योंकि वे हिमालय के ठंडे क्षेत्रों और बर्फ के पास कठोर साधना करते हैं।
खूनी नागा: उज्जैन में दीक्षा लेने वाले साधुओं को खूनी नागा कहा जाता है। यह नाम उनके भीतर धर्म की रक्षा के लिए उग्रता, क्षत्रिय भाव और किसी भी हद तक जाने वाले दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।
राजराजेश्वरी नागा: प्रयागराज में दीक्षा लेने वाले साधुओं को राजराजेश्वरी नागा कहा जाता है, जो त्रिवेणी संगम के शाही स्वरूप को प्रदर्शित करता है।