महाराष्ट्र के नांदेड में स्थित माहूरगढ़ को साडेतीन शक्तिपीठों में से एक प्रमुख स्थान माना जाता है।
राजा सहस्रार्जुन के आक्रमण और महर्षि जमदग्नि की शहादत के बाद भगवान परशुराम ने लिया था प्रण।
तीन पहाड़ियों पर बसे इस पवित्र क्षेत्र में माता रेणुका का केवल मुखमंडल ही स्वयंभू रूप में पूजित है।
Mahur Shaktipeeth history: महाराष्ट्र के नांदेड जिले में बसा माहुर क्षेत्र देश भर के श्रद्धालुओं के लिए अगाध आस्था का केंद्र है। प्राचीन ग्रंथों और देवी भागवत में मातापुर के नाम से वर्णित यह पावन स्थल महाराष्ट्र के साडेतीन शक्तिपीठों में मुख्य माना जाता है।
यहां माता रेणुका का स्वयंभू रूप स्थापित है, जहां देवी का केवल मुखमंडल ही भूमि के ऊपर दृश्यमान है। इस पवित्र तीर्थस्थल का संबंध भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम, उनके पिता महर्षि जमदग्नि और त्रिदेवों के अवतार भगवान दत्तात्रेय से गहराई से जुड़ा हुआ है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी रेणुका राजा रेणु की पुत्री और महर्षि जमदग्नि की धर्मपत्नी थीं। महर्षि जमदग्नि के आश्रम में इच्छा पूरी करने वाली दिव्य कामधेनु गाय निवास करती थी। एक बार महिष्मती का राजा सहस्रार्जुन जमदग्नि ऋषी के आश्रम में आया और कामधेनु के प्रभाव से हुए भव्य आतिथ्य को देखकर चकित रह गया।
कामधेनु को बलपूर्वक छीनने के उद्देश्य से सहस्रार्जुन ने महर्षि के आश्रम पर आक्रमण कर दिया। इस संघर्ष में महर्षि जमदग्नि वीरगति को प्राप्त हुए और माता रेणुका भी गंभीर रूप से घायल हो गईं।
जब भगवान परशुराम को इस जघन्य अपराध का पता चला, तो उन्होंने सहस्रार्जुन का वध करने का प्रण लिया। इसके पश्चात, परशुराम अपने माता-पिता के पार्थिव शरीर को लेकर माहुर क्षेत्र पहुंचे। माहुर क्षेत्र में भगवान दत्तात्रेय प्रकट हुए और उनके मार्गदर्शन में भगवान परशुराम ने अपने पिता का अंतिम संस्कार कर्म संपन्न किया। अंतिम संस्कार हेतु पवित्र जल उपलब्ध कराने के लिए परशुराम ने अपने बाणों के संधान से 'मातृतीर्थ' की रचना की।
पिता के दाह संस्कार के बाद जब माता रेणुका सती होने लगीं, तब पुत्र परशुराम शोक में डूबकर टाहो फोड़ने लगे। तब माता रेणुका ने परशुराम को वचन दिया कि वे एक माह के भीतर उन्हें सदेह दर्शन देंगी। परंतु, परशुराम के अत्यंत आर्त स्मरण के कारण 13वें दिन ही माता रेणुका धरती से प्रकट होने लगीं।
आकाशवाणी ने परशुराम को पीछे न देखने की चेतावनी दी थी, किंतु उत्सुकतावश परशुराम ने पलक झपकते ही पीछे मुड़कर देख लिया। इस कारण माता का केवल मुखमंडल (शिर) ही भूमि से बाहर आ पाया, जो आज भी माहूरगढ़ में स्वयंभू रूप में पूजित है।
नांदेड जिले में माहुरागढ़ तीन पहाड़ियों पर बसा हुआ है। पहली पहाड़ी पर श्री रेणुका देवी का भव्य 12वीं-13वीं शताब्दी का मंदिर स्थित है। दूसरी पहाड़ी पर दत्त शिखर है, जिसे भगवान दत्तात्रेय का जन्मस्थान माना जाता है, और तीसरी पहाड़ी पर माता अनसूया का मंदिर स्थित है। नवरात्र और विजयादशमी के अवसर पर यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है, जहां लाखों श्रद्धालु देवी माँ के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।