बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर खंडपीठ (सोर्स: सोशल मीडिया) 
नागपुर

निर्मल को-ऑपरेटिव घोटाला: बॉम्बे हाई कोर्ट ने SIT को दिया ‘फ्री हैंड’, 1400 करोड़ के गबन की जांच में आई तेजी

Nirmal Co-operative Scam: निर्मल को-ऑपरेटिव सोसाइटी में 1400 करोड़ रुपये के कथित घोटाले पर बॉम्बे हाई कोर्ट सख्त है। कोर्ट ने SIT को सेंट्रल रजिस्ट्रार की भूमिका की जांच के आदेश दिए हैं।

आकाश मसने

Bombay High Court On Nirmal Co-operative Scam: निर्मल को-ऑपरेटिव सोसाइटी में धन के कथित गबन और हेराफेरी को लेकर मामला दर्ज नहीं होने के कारण अंतत: पुट्टेवार और अन्य की ओर से बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया। एक बड़े वित्तीय घोटाले की सुनवाई के दौरान न्यायाधीश अनिल पानसरे और न्यायाधीश निवेदिता मेहता ने विशेष जांच टीम (SIT) को स्पष्ट निर्देश देते हुए मामले की तह तक जाने और सच्चाई सामने लाने के लिए ‘फ्री हैंड’ (खुली छूट) दे दी है। यह मामला लगभग 1,400 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि के दांव पर लगे होने से जुड़ा है। कोर्ट ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की गई तो जमाकर्ताओं का एक बड़ा पैसा डूब सकता है।

सेंट्रल रजिस्ट्रार की भूमिका पर सवाल

बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर खंडपीठ में सुनवाई के दौरान बताया गया कि तत्कालीन पुलिस कमिश्नर ने सेंट्रल रजिस्ट्रार को पत्र लिखकर इस बड़े धोखाधड़ी के बारे में सूचित किया था लेकिन रजिस्ट्रार कार्यालय की ओर से अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई। अदालत ने सवाल उठाया कि जब ऑडिट रिपोर्ट में अनियमितताएं सामने आ गई थीं तो सेंट्रल रजिस्ट्रार ने सोसाइटी के खिलाफ परिसमापन या अन्य दंडात्मक कदम क्यों नहीं उठाए। कोर्ट ने SIT को यह जांचने का निर्देश दिया है कि क्या सेंट्रल रजिस्ट्रार की चुप्पी के पीछे कोई खास वजह थी या उन्होंने जानबूझकर इन तथ्यों को नजरअंदाज किया।

पुलिस और विभाग के बीच पत्राचार की जांच

SIT वर्तमान में पुलिस अधिकारियों और सेंट्रल रजिस्ट्रार, नई दिल्ली के बीच हुए अंतर-विभागीय संचार की जांच कर रही है। अब तक 5 पुलिस अधिकारियों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं। अदालत ने कहा कि फिलहाल जांच एजेंसी को पूरी स्वतंत्रता दी जा रही है लेकिन यदि जांच में किसी भी तरह की कोताही या तथ्यों को छिपाने की कोशिश पाई गई तो SIT के आचरण पर भी टिप्पणी की जाएगी।

बढ़ता कर्ज और शेल कंपनियों का जाल

जांच के दौरान यह भी सामने आया है कि ऋण की राशि लगातार बढ़ रही है। एक मामले में 3 करोड़ रुपये का मूल ऋण बढ़कर 10 करोड़ रुपये हो गया और कुल बकाया 31 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इसके अलावा एक कंपनी के माध्यम से एक शेल कंपनी को ऋण मंजूर करने के मामले में भी अतिरिक्त सबूत जुटाए गए हैं जो आईपीसी (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत अपराध की श्रेणी में आते हैं।

30 अप्रैल 2026 तक रिपोर्ट तलब

अदालत ने SIT को अपनी जांच में तेजी लाने और 30 अप्रैल 2026 तक इसे पूरा करने का लक्ष्य दिया है। सहकारिता मंत्रालय ने भी अदालत से अनुरोध किया है कि उन्हें SIT के निष्कर्षों पर अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए। फिलहाल SIT की सक्रियता के कारण स्थिति में कुछ सुधार दिख रहा है। ऋणों की अदायगी शुरू हो गई है और परिसरों का किराया भी चुकाया जा रहा है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि भविष्य में होने वाले नुकसान को रोकने के लिए उचित कदम उठाए जाएं।

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