BJP में बगावत प्रतीकात्मक तस्वीर, सोर्स- AI
नागपुर

नागपुर विधान परिषद सीट, BJP में बगावत का पुराना इतिहास, अनिस सोले से पहले मते और व्यास भी हो चुके हैं बागी

Nagpur Graduates Constituency Election: नागपुर स्नातक चुनाव में सुधाकर कोहले को टिकट मिलते ही पूर्व मेयर अनिल सोले ने निर्दलीय मैदान में उतरने का ऐलान कर दिया है। पार्टी में हड़कंप मच गया है।

प्रमोद यादव

Anil Sole Rebel BJP Nagpur: नागपुर संभाग स्नातक चुनाव राजनीतिक पार्टियों में चुनाव के समय उम्मीदवारी को लेकर दावेदार अधिक होते हैं लेकिन टिकट किसी एक को मिलता है। ऐसे में कुछ दावेदार बगावत का रास्ता अपनाते हैं। भाजपा जैसी अनुशासित पार्टी में ऐसा अन्य पार्टियों की अपेक्षा कम देखा जाता है।

लेकिन इस बार विधान परिषद के नागपुर संभाग स्नातक चुनाव क्षेत्र से जैसे ही सुधाकर कोहले के नाम की घोषणा हुई पूर्व विप सदस्य व पूर्व मेयर अनिल सोले ने भी बगावत का रास्ता अख्तियार कर लिया। उन्होंने सोशल मीडिया में घोषणा की कि वे भी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपना नाांकन दाखिल करेंगे।

ऐसा कर वे भी नागपुर में भाजपा के कुछ बागियों की सूची में शामिल हो गए। पार्टी में हड़कंप मचा हुआ है और चर्चा यह है कि अपना राजनीतिक सफर एबीवीपी से शुरू करने, 5 बार नगरसेवक बनने, मेयर से लेकर इसी सीट से 2014 में विधान परिषद पहुंचने वाले सोले जैसा वरिष्ठ नेता 'पाटी लाइन' से बाहर कैसे जा सकता है।

2009 के विधानसभा चुनावों में मोहन मते व गिरीश व्यास ने बगावत की थी। हालांकि व्यास ने अपना नाम वापस ले लिया था। अब उनके साथ सोले भी बागियों की सूची में शामिल हो गए हैं।

आमचं ठरलं जैसी पोस्ट

पूर्व मेयर अनिल सोले ने भी टिकट की मांग की थी, काफी पहले से तैयारी भी शुरू कर दी थी। मतदाता पंजीयन के साथ ही वे लगातार मतदाताओं के संपर्क में थे, पिछले 2 महीने से उन्होंने इस सीट पर अपनी दावेदारी पेश की थी।

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की मौजूदगी में अनिल सोले समर्थकों ने शक्ति प्रदर्शन कर उनकी दावेदारी कायम रखी, करीब एक सप्ताह पहले ही उन्होंने चुनाव लाहने का संकल्प भी व्यक्त किया था। फिर उनके समर्थकों ने सोशल मीडिया में 'आमचं ठरलं' जैसी पोस्ट डालकर बगावत का संकेत पहले ही दे दिया था।

ये सोमवार को दोपहर 1.30 बजे नामांकन दाखित करेंगे, दरअसल, 2020 में सोले ने दोबारा टिकट मांगा था लेकिन सिटिंग विधायक होने के बावजूद उनका टिकट काटकर संदीप जोशी को उम्मीदवार बनाया गया था। जोशी वह चुनाव हार गए। अब दोबारा सीले ने दावेदारी की थी।

डैमेज कंट्रोल के लिए भागदौड़

अनिल सोले के चुनाव लड़ने के फैसले से भाजपा नेताओं को झटका लगा है और डैमेज कंट्रोल के लिए पार्टी में भागदौड शुरू हो गई है। उन्हें मनाने के प्रयास किए जाएंगे, डैमेज कंट्रोल में जुटे पार्टी के रणनीतिकारों ने भरोसा जताया है कि दो-तीन दिनों में सोले अपना नामांकन पत्र वापस ले लेंगे, सोले भाजपा की कोर कमेटी के सदस्य है।

रविवार शाम हुई बैठका में उन्हें भी बुलाया गया था, लेकिन वे बैठक में शामिल नहीं हुए। उनकी उम्मीदवारी से होने वाले नुकसान का भी आकलन किए जाने की जानकारी है, वहीं एडवोकेट रमन संनाह को भी मनाने के प्रयास किए जाएंगे देखना का होगा कि ये बागी अपना नाम वापस लेते हैं या मैदान में डटे रहते है।

सेनाड भी बढ़ाएंगे संकट

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिशु गग से ही संघ कार्य से जुड़ाव होने का दावा करते हुए एड। रमन सेनाह ने अभाविप, विहिप और भाजपा में किए गए अपने कार्यों का हवाला देते हुए उम्मीदवारी का दावा किया था।

इस संबंध में उन्होंने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से भी मुलाकात कर उम्मीदवारी के लिए आसाह किया था।

पाटों द्वारा उनकी मांग पर ध्यान नहीं दिए जाने के बाद सेनाड लोकजागृति मीचर्चा की ओर से अपना नामांकन दाखिल करने वाले हैं। वे भी भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार के लिए संकट बढ़ाने का काम करेंगे।

मते व व्यास भी हुए थे बागी

बता दें कि मोहन मते ने 2009 में भाजपा के खिलाफ बगावत की थी। 2009 में दक्षिण नागपुर सीट शिवसेना के हिस्से में गई थी। मते को यह स्वीकार नहीं था। पार्टी के आधिकारिक फैसले के बावजूद मते ने चुनाव लड़ने का निर्णय लिया।

उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन पत्र दाखिल किया था और चुनाव मैदान में बने रहे, बाद में मरो को पार्टी से बाहर कर दिया गया और वे करीब एक दशक तक पार्टी से बाहर रहे 2014 के बाद उन्हें फिर भाजपा में शामिल किया गया और वे अब विधायक हैं।

2009 के ही विस चुनाव में निरीश व्यास ने भाजपा से टिकट न मिलने पर बगावत की थी, लेकिन मोहन मते की तरह अंत तक चुनाव नहीं लड़ा, व्यास मध्य नागपुर सीट से दावेदार थे। लेकिन पार्टी ने यह सीट विकास कुंभारे को दी थी। इसके बाद व्यास ने बगावत करते हुए निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल कर दिया। हालांकि नितिन गडकरी से मुलाकात के बाद उन्होंने नाम वापस ले लिया था।

राजशेखर गोपावार नवभारत।

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