Nagpur Footpath Encroachment: नागपुर हाई कोर्ट की फटकार के बाद मनपा प्रशासन ने सिटी के फुटपाथों को अतिक्रमण मुक्त करने के लिए '100-डेज' का अभियान चलाया था। हर इलाके अतिक्रमणकारियों के खिलाफ धुआंधार कार्रवाई हुई। कार्रवाई तो अभी भी चल ही रही है लेकिन प्रशासन पर अतिक्रमणकारी भारी पड़ रहे हैं। अभियान ही फ्लॉप हो गया कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
सिटी के सभी सड़कों पर फुटपाथ पर ठेलो, गुमटियों का कब्जा है। पैदल चलने के लिए राहगीरों को जगह ही नहीं मिलती। कुछ ऐसी जगहें हैं जहां फुटपाथ पर टेबल-कुर्सी जमाकर चाय-नाश्ता करवाया जा रहा है। कहीं-कहीं तो सड़कों के किनारे ही कब्जा जमा हुआ है। कार्रवाई दिन में होती है। दस्ता जैसे ही पहुंचता है ठेले-गुमटी वाले इधर-उधर हो जाते हैं और फिर एकाध घंटे में ही हालात 'जैसे थे' हो जाते हैं।
रात में जमाते हैं कब्जा मनपा का दस्ता रात के समय कोई कार्रवाई नहीं करता है। इसका लाभ उठाते हुए अधिकतर खान-पान के ठेले, गाड़ियां देर शाम से ही जमना शुरू करते हैं। सड़क के किनारे ठीया जमाते हैं और पीछे फुटपाथ पर ग्राहकों के लिए कुर्सी टेबल सजाते हैं। ऐसे ओपन रेस्टोरेंट की शहर में बाढ़ सी आ गई है। बेखौफ होकर ये अपनी मनमानी करते हैं।
इवनिंग वॉक पर निकलने वाले नागरिकों को फुटपाथ में चलने को जगह ही नहीं मिलती। सिटी में अनेक चौराहों, उद्यानों, अघोषित बस स्टैंड, ऑटोस्टैंड, शराब की दुकानों, बाजार परिसरों में ऐसा नजारा देखने को मिल रहा है।
संख्या बढ़ती ही जा रही है। दशकों से नगर प्रशासन सिटी के हॉकरों के लिए ठोस नीति नहीं बना पाया है। हॉकर्स जोन तो कागजों में दम तोड़ चुका है। अनेक ऐसे शहर हैं जहां फुटपाथ अतिक्रमणमुक्त हैं लेकिन शायद नगर प्रशासन की इच्छाशक्ति की कमी के चलते नागपुर में सफलता नहीं मिल पा रही है।
हालत यह है कि शहर के अनेक इलाकों में तो फुटपाथ पर सोफा आलमारी, फर्नीचर के बाजार भर रहे हैं। 10 से 12 ऐसे स्पाट हैं जहां फुटपाथों पर पुराने दोपहिया व कारों का बाजार लग रहा है। आश्चर्य की बात तो यह है कि पुरानी कारों के विक्रेता 100-200 मीटर तक फुटपाथ पर 24 घंटे कारें सजाकर रख रहे हैं।
मनपा प्रशासन चाय-पान की टपरियों, सब्जी-फल विक्रेताओं पर तो नियमित कार्रवाई करता है लेकिन ऐसे लोगों के रसूख को देखते हुए उनकी ओर आंख उठाकर भी नहीं देखता। मेडिकल चौक से तुकड़ोजी पुतला की ओर जाने वाली सड़क पर हो या नंदनवन, महल के कुछ इलाके, यहां फुटपाथ पर कतार से बिकने को कारें व दोपहिया वाहन सजी नजर आती है। आज तक इनकी एक भी कार जब्त करने का उदाहरण सामने नहीं आया है।
फुटपाथ हजारों परिवारों की रोजी-रोटी की जगह बन गई है। निश्चित तौर पर ठेले-गुमटी वाले अपना परिवार इसी के भरोसे पाल-पौस रहे है। इनके लिए अधिकृत तौर पर अगर शहर के अलग-अलग इलाकों में स्थान निर्धारित कर छोटी-छोटी दुकान बनाकर दे दी जाएं तो समस्या का समाधान हो सकता है।
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हॉकर्स जोन की नीति बनी हुई है लेकिन केवल सीताबर्डी के हॉकरों तक ही सीमित नजर आती है। अब तक यह मामला भी लटका ही हुआ है। सिटी को सिंगापुर की तर्ज पर विकसित करने का सपना दिखाने वाले जनप्रतिनिधियों की शायद नीयत ही नहीं है कि शहर की व्यवस्था में सुधार आए और लोगों को पैदल चलने के लिए उनका फुटपाथ उपलब्ध हो। हाई कोर्ट की जब फटकार पड़ती है तभी कुछ दिन के लिए प्रशासन खानापूर्ति करने मैदान में उतरता है और फिर ठंडा हो जाता है।