भारतीय जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में गई थी।
जनसंघ के विस्तार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अहम योगदान।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय और नानाजी देशमुख जैसे संघ प्रचारकों ने दी सांगठनिक मजबूती।
Jan Sangh Foundation History: 21 अक्टूबर 1951 की वो सुबह देश के राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी करवटों में से एक थी। दिल्ली के रघुमल आर्य कन्या विद्यालय के एक छोटे से हॉल में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने एक नए राजनीतिक दल की घोषणा की भारतीय जनसंघ। दिल्ली की मेज पर भले ही इस नए दल के दस्तावेज तैयार हो रहे थे, लेकिन इस नए संगठन के पीछे जो वैचारिक और सांगठनिक ऊर्जा काम कर रही थी, उसका पावर हाउस दिल्ली से सैकड़ों किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के नागपुर में धड़क रहा था।
आज जब हम भारतीय जनसंघ के स्थापना दिवस और उसके सफर को देखते हैं, तो लगता है इस दल के जन्म की अनसुनी कहानी महाराष्ट्र की जमीन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के आधार के बिना अधूरी है। यह केवल एक राजनीतिक दल की स्थापना की कहानी नहीं है, बल्कि आज के दौर की दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी यानी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उदय की नींव है।
1951 में जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट से इस्तीफा देने के बाद डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक ऐसे राजनीतिक विकल्प की तलाश में थे, जो कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीतियों के खिलाफ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मुखर आवाज दे सके। मुखर्जी के पास कद था, विजन था, लेकिन देशव्यापी संगठन नहीं था।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर (गुरुजी) से मुलाकात की। गुरुजी ने मुखर्जी के राष्ट्रवाद के विचार को समर्थन दिया और संघ के कुछ सबसे कुशल, ऊर्जावान और सांगठनिक रूप से बेजोड़ प्रचारकों को राजनीतिक क्षेत्र में काम करने के लिए भेजा।
ये चेहरे कोई और नहीं, बल्कि महाराष्ट्र और संघ की सांगठनिक पाठशाला से निकले दिग्गज थे।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय: जिन्हें बाद में जनसंघ का मार्गदर्शक और एकात्म मानववाद का प्रणेता कहा गया।
नानाजी देशमुख: महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में जन्मे नानाजी को जनसंघ को उत्तर प्रदेश और देश के ग्रामीण अंचलों में स्थापित करने की जिम्मेदारी मिली, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया।
भाऊराव देवरस: जिन्होंने परदे के पीछे रहकर इस नए राजनीतिक दल की सांगठनिक रीढ़ तैयार की।
दिल्ली में जब जनसंघ का दीया जला, तो उसमें घी और बाती का काम नागपुर से गए इन्हीं चेहरों ने किया था।
गांधीजी की हत्या के बाद तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने 6 मई, 1948 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पत्र लिखकर गांधीजी की हत्या के लिए आरएसएस को जिम्मेदार ठहराया। उस समय गोलवलकर ने कथित तौर पर कहा था कि इस एक घटना से आरएसएस 50 साल पीछे धकेल दिया गया।
कहा जाता है कि तत्कालीन सरसंघचालक एम एस गोलवलकर जनसंघ के विचार के विरोधी थे, लेकिन बाबासाहेब घटाते ने उन्हें फिर से मना लिया। जनसंघ की स्थापना के संबंध में प्रारंभिक बैठकें घटाते के नागपुर स्थित घर में हुईं, जहां मुखर्जी आरएसएस नेताओं से मिलते थे। लेकिन 1967 तक जनसंघ का विकास सीमित ही रहा।
1967 में, जनसंघ के संगठन सचिव नानाजी देशमुख ने एक साक्षात्कार में कहा था कि मुझे वह कारण मिल गया है जिसकी वजह से जनसंघ को जनता का समर्थन नहीं मिल रहा था। क्योंकि लोग मानते हैं कि आरएसएस और जनसंघ गांधीजी के हत्यारे हैं। यह देश गांधीजी के हत्यारों का कभी समर्थन नहीं करेगा।
नानाजी देशमुख ने बाद में कहा कि इसलिए मैंने हर तरह की तरकीब अपनाई और राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण के करीब आ गया। इन दोनों के स्वीकार करने के बाद ही बाकी देश ने हमें स्वीकार करना शुरू किया।
स्थापना के ठीक बाद, 1950 के दशक में जनसंघ के सामने महाराष्ट्र की धरती पर ही अपनी पहचान बनाने की पहली बड़ी चुनौती आई। वह दौर था संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन का, जहां मराठी भाषी जनता अपने अलग राज्य की मांग को लेकर सड़कों पर थी।
जनसंघ ने इस जन-आकांक्षा का सम्मान किया और आंदोलन का पुरजोर समर्थन किया। महाराष्ट्र में जनसंघ के शुरुआती दौर के नेताओं, जैसे जगन्नाथराव जोशी और उत्तमराव पाटिल ने राज्य के कोने-कोने में घूमकर जनसंघ के वैचारिक आधार को मजबूत किया।
1975 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश पर आपातकाल थोपा गया, तो जनसंघ के नेताओं ने जेलों को अपना घर बना लिया। लोकतंत्र की बहाली के लिए 1977 में जनसंघ ने खुद के वजूद को मिटाकर जनता पार्टी में विलय कर लिया। लेकिन यह प्रयोग ज्यादा दिन नहीं चला। जनता पार्टी के भीतर 'दोहरी सदस्यता' यानी आरएसएस और जनता पार्टी दोनों के सदस्य होने को लेकर विवाद खड़ा हो गया।
जनता पार्टी में दोहरी सदस्यता को लेकर उठे विवाद के बाद पूर्व जनसंघी नेताओं ने दिल्ली में दोबारा जुटने का फैसला किया। 6 अप्रैल 1980 को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और मदनलाल खुराना जैसे वरिष्ठ नेताओं ने मिलकर भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की। इसमें अटल बिहारी वाजपेयी को पार्टी का पहला राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया।
भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने मुंबई के शिवाजी पार्क में हुए पहले ऐतिहासिक अधिवेशन में गरजते हुए कहा था "अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा।"