Supreme Court Hearing Shiv Sena Symbol Case: महाराष्ट्र की राजनीति में असली शिवसेना किसकी है, यह लड़ाई अब अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही हालिया सुनवाई के दौरान उद्धव ठाकरे गुट के वकील कपिल सिब्बल ने ऐसी जोरदार दलीलें और तीखे सवाल पेश किए हैं, जिसने उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के खेमे में हलचल पैदा कर दी है।
सिब्बल का पूरा जोर इस बात पर था कि शिवसेना में फूट के बाद बनी मौजूदा सरकार पूरी तरह से अवैध है और उद्धव ठाकरे ही पार्टी के असली प्रमुख बने हुए हैं।
अदालत की कार्यवाही में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब कपिल सिब्बल ने शिवसेना पार्टी के संविधान का मुद्दा उठाया। सिब्बल ने विस्तार से बताया कि बालासाहेब ठाकरे के बाद उद्धव ठाकरे ने विधिवत रूप से पार्टी की कमान संभाली थी। उन्होंने पार्टी के संविधान की धारा 11-अ का हवाला देते हुए कहा कि इसके तहत तीन उप-नेताओं की नियुक्ति की गई थी और इसकी जानकारी चुनाव आयोग को भी दी गई थी।
सिब्बल ने अदालत को याद दिलाया कि 2018 में उद्धव ठाकरे का चुनाव निर्विरोध हुआ था और उन्होंने ही एकनाथ शिंदे को पार्टी के नेता के रूप में नियुक्त किया था। रोचक बात यह है कि जिस पार्टी संविधान के आधार पर ये सारी नियुक्तियां हुईं, उसे शिंदे गुट या किसी अन्य ने उस समय कभी चुनौती नहीं दी थी।
कपिल सिब्बल ने अदालत में सबसे मारक सवाल यह पूछा कि जब 2019 से 2022 के बीच उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री थे और एकनाथ शिंदे उनके मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री थे, तब उन्होंने पार्टी संविधान की वैधता पर कभी सवाल क्यों नहीं उठाया?। सिब्बल ने तर्क दिया कि अगर 2013 या 2018 का पार्टी संविधान अस्तित्व में नहीं था या अवैध था, तो शिंदे ने उस नेतृत्व के तहत मंत्री पद कैसे स्वीकार किया?
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शिवसेना ने 2019 के लोकसभा चुनावों में 18 सीटें इसी पार्टी संविधान और नेतृत्व के तहत जीती थीं। सिब्बल ने चुनाव आयोग की भूमिका पर भी प्रहार करते हुए कहा कि आयोग को यह तय करने का अधिकार ही नहीं है कि किसी राजनीतिक दल का संविधान वैध है या नहीं। आयोग ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उनके पास पार्टी संविधान का रिकॉर्ड नहीं है, जिसे सिब्बल ने एक गंभीर विसंगति बताया।
सिब्बल की दलीलों के बीच CJI ने भी कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे। न्यायालय ने जानना चाहा कि क्या धारा 11-अ के बारे में जनवरी 2013 में चुनाव आयोग को सूचित किया गया था और क्या उन दस्तावेजों पर हस्ताक्षरों की पुष्टि की जा सकती है।
फिलहाल, सिब्बल की इन दलीलों ने शिवसेना शिंदे गुट की कानूनी राह को कठिन बना दिया है। यदि पार्टी संविधान और नियुक्तियों की वैधता पर उद्धव ठाकरे का पक्ष भारी पड़ता है, तो न केवल सरकार के गठन पर सवाल उठेंगे, बल्कि शिवसेना का नाम और धनुष-बाण चुनाव चिन्ह भी शिंदे गुट के हाथ से फिसल सकता है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सुप्रीम कोर्ट इन संवैधानिक पहलुओं पर क्या अंतिम फैसला सुनाता है।