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BMC RV Anderson Case: 25 साल पुरानी कानूनी लड़ाई पर उठे सवाल, करदाताओं पर बढ़े वित्तीय बोझ की जांच की मांग

Supreme Court Ruling: सुप्रीम कोर्ट से बीएमसी की अपील खारिज होने के बाद आर.वी. एंडरसन मामले में कानूनी व वित्तीय फैसलों पर सवाल उठे हैं। कांग्रेस ने पूरे विवाद की जांच की मांग की है।

रूपम सिंह

Mumbai BMC RV Anderson Case: मुंबई की सीवरेज व्यवस्था से जुड़ी आर.वी. एंडरसन एसोसिएट्स लिमिटेड की कंसल्टेंसी के मामले में बीएमसी की कानूनी और वित्तीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

बीएमसी कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि 2001 में काम पूरा होने और 2010 में मध्यस्थता निर्णय आने के बावजूद लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया के कारण ब्याज तथा विदेशी मुद्रा के उतार-चढ़ाव से महानगरपालिका पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा।

2010 में आया था मध्यस्थता अवॉर्ड

सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, बीएमसी ने 1995 में मुंबई शहर की सीवरेज व्यवस्था के संचालन और रखरखाव को उन्नत करने के लिए कनाडा की कंपनी आर.वी. एंडरसन एसोसिएट्स के साथ समझौता किया था। यह विश्व बैंक से वित्तपोषित परियोजना थी। कंपनी ने 20 जून 2001 को अपना काम पूरा कर अंतिम रिपोर्ट सौंप दी थी। इसके बाद बकाया भुगतान को लेकर विवाद पैदा हुआ।

5 जून 2010 को तीन सदस्यीय मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने बीएमसी को 20,78,349.25 अमेरिकी डॉलर और 14,76,736 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया था। इसके अलावा कुछ निर्धारित राशि पर 16 जून 2004 से भुगतान या वसूली तक 14 प्रतिशत वार्षिक ब्याज तथा मध्यस्थता लागत का भी आदेश दिया गया था।

हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

मध्यस्थता अवॉर्ड को चुनौती देते हुए बीएमसी ने बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया। हाई कोर्ट ने बीएमसी की चुनौती खारिज कर दी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने भी बीएमसी की अपीलें खारिज कर दीं और निचली अदालतों द्वारा मध्यस्थता अवॉर्ड में हस्तक्षेप से इनकार करने के फैसले को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में मुख्य सवाल मध्यस्थ न्यायाधिकरण के गठन और उससे संबंधित आपत्ति का था। अदालत ने कहा कि मामले के तथ्यों के आधार पर न्यायाधिकरण के गठन को अवैध नहीं माना जा सकता और निचली अदालतों का अवॉर्ड में हस्तक्षेप से इनकार उचित था।

कानूनी रणनीति पर जांच की मांग

बीएमसी कांग्रेस के अनुसार, 2010 के मध्यस्थता निर्णय के बाद भी कानूनी लड़ाई जारी रखने से देनदारी पर ब्याज और विदेशी मुद्रा विनिमय दर के बदलाव का असर पड़ा। कांग्रेस गुट नेता अशरफ आजमी ने इस पूरे मामले की कानूनी, वित्तीय और प्रशासनिक स्तर पर जांच की मांग की है।

उन्होंने सवाल उठाया है कि 2010 के फैसले के बाद आगे कानूनी कार्रवाई जारी रखने की सलाह किस अधिकारी ने दी, इसकी सिफारिश और मंजूरी किस स्तर पर हुई तथा संबंधित वकीलों और कानूनी सलाहकारों ने क्या राय दी थी।

हर अपील का लागत-लाभ आकलन सार्वजनिक करने की मांग

आजमी ने प्रत्येक अपील से पहले किए गए लागत-लाभ आकलन को सार्वजनिक करने की मांग की है। उनका कहना है कि मामले में विदेशी मुद्रा में देनदारी होने के कारण विनिमय दर में बदलाव भी वित्तीय प्रभाव डाल सकता है।

हालांकि, इन आरोपों को बीएमसी कांग्रेस की मांग और राजनीतिक पक्ष के रूप में देखा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2026 के फैसले में बीएमसी की कानूनी चुनौती पर फैसला मध्यस्थता न्यायाधिकरण के गठन से जुड़े मुद्दे पर था।

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