Jagannath Giri vs Babulnath Trust प्रतीकात्मक तस्वीर 
मुंबई

Babulnath Temple Case: 75 वर्षीय भिक्षु को सुप्रीम कोर्ट से राहत, मंदिर छोड़ने के लिए मिली 4 साल की मोहलत

Babulnath Temple Case Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने बाबुलनाथ मंदिर के एक हिस्से को खाली करने के लिए 75 वर्षीय भिक्षु को 4 साल का समय दिया है। अदालत ने मानवीय आधार पर यह रियायत दी।

अनिल सिंह

Jagannath Giri vs Babulnath Trust: मुंबई के ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित बाबुलनाथ मंदिर के एक हिस्से को लेकर पिछले कई दशकों से चल रहा कानूनी विवाद अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में मंदिर परिसर के एक छोटे से हिस्से पर काबिज 75 वर्षीय भिक्षु, जगन्नाथ गिरि, को अगले चार वर्षों के भीतर जगह खाली करने का आदेश दिया है।

अदालत ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा है जिसमें भिक्षु को बेदखल करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, याचिकाकर्ता की उन्नत आयु और उनके धार्मिक जीवन को देखते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने मानवीय आधार पर चार साल की लंबी मोहलत दी है।

1968 से जारी कब्जे पर सुप्रीम कोर्ट का रुख

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने माना कि निचली अदालतों और बॉम्बे हाई कोर्ट के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी आधार नहीं है। यह विवाद मंदिर की मुख्य सीढ़ियों के पास स्थित एक चबूतरे के छोटे से हिस्से को लेकर है, जिस पर भिक्षु जगन्नाथ गिरि के गुरु बाबा ब्रह्मानंदजी महाराज 1968 से काबिज थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि यह कब्जा दशकों पुराना है और किराया भी चुकाया गया है, लेकिन मंदिर ट्रस्ट को अपनी संपत्ति का कब्जा वापस लेने का कानूनी अधिकार है।

बुजुर्ग भिक्षु को 4 साल की दुर्लभ मोहलत

आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट परिसर खाली करने के लिए इतना लंबा समय नहीं देता, लेकिन इस मामले में याचिकाकर्ता की स्थिति विशेष थी, मानवीय आधार पर ये फैसला लिया गया है।  अदालत ने स्वीकार किया कि जगन्नाथ गिरि 75 वर्ष के हैं और अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर पूरी तरह आध्यात्मिक जीवन जी रहे हैं। वैकल्पिक आवास के बारे में पीठ ने कहा कि चार साल की अवधि इसलिए दी जा रही है ताकि वे अपने लिए कोई अन्य उपयुक्त स्थान खोज सकें। आदेश में कहा गया है कि भिक्षु जब तक वहां रहेंगे, शांतिपूर्वक रहेंगे और मंदिर के विकास कार्यों में कोई बाधा नहीं डालेंगे।

1927 से शुरू हुई कानूनी लड़ाई का इतिहास

इस मामले की जड़ें आजादी से पहले के समय तक जाती हैं। यह परिसर 1927 में बाबा रामगिरी महाराज को किराए पर दिया गया था। उनकी मृत्यु के बाद उनके शिष्य बाबा ब्रह्मानंदजी ने कब्जा जारी रखा। मंदिर ट्रस्ट ने 1996 में लघु वाद न्यायालय (Small Causes Court) में बेदखली का मुकदमा जीता। इसके बाद यह मामला अपीलीय पीठ और फिर बॉम्बे हाई कोर्ट पहुँचा। हाई कोर्ट ने 6 नवंबर 2025 को याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। सर्वोच्च न्यायालय ने अब निर्देश दिया है कि ट्रस्ट यह सुनिश्चित करे कि भिक्षु को वहां रहते हुए किसी तीसरे पक्ष द्वारा परेशान न किया जाए। यह फैसला कानूनी सख्ती और मानवीय संवेदनाओं के बीच एक संतुलन के रूप में देखा जा रहा है।

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