Thackeray Lawyer Top Arguments: महाराष्ट्र के सबसे बड़े सियासी और कानूनी दंगल की गूंज एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में जोरदार तरीके से सुनाई दे रही है। शिवसेना फूट और धनुष-बाण चिन्ह को लेकर चल रही इस लड़ाई में उद्धव ठाकरे गुट के वरिष्ठ वकील देवदत्त कामत ने अदालत के सामने ऐसी धारदार दलीलें पेश की हैं, जो एकनाथ शिंदे सरकार की कानूनी नींव को हिला सकती हैं।
जब सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने ठाकरे गुट से सवाल किया कि क्या कोर्ट खुद विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका में जाकर इन विधायकों को अपात्र घोषित कर सकता है? इस पर देवदत्त कामत ने न सिर्फ हां में जवाब दिया, बल्कि कई ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देकर यह साबित करने की कोशिश की कि कुछ विशेष और असाधारण परिस्थितियों में अदालत को विधायकों को सीधे अपात्र घोषित करने का पूरा अधिकार है।
देवदत्त कामत ने अदालत के सामने सबसे बड़ा और दूरगामी कानूनी मुद्दा यह उठाया कि चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट को शिवसेना पार्टी का नाम और धनुष-बाण का चिन्ह केवल विधानसभा में उनके बहुमत के आधार पर दिया था।
लेकिन हकीकत यह है कि दलबदल विरोधी कानून के तहत वे सभी विधायक शुरुआत से ही अपात्र होने के हकदार थे क्योंकि उन्होंने मूल पार्टी को छोड़ने का स्वतंत्र निर्णय लिया था।
कामत ने तर्क दिया कि यदि सुप्रीम कोर्ट आज भी यह तय कर देता है कि शिंदे और उनके सहयोगियों ने मूल पार्टी का त्याग किया था और वे अपात्र हैं, तो उसी क्षण उस मुख्य आधार का वजूद ही खत्म हो जाएगा, जिसके बल पर चुनाव आयोग ने उन्हें पार्टी का चिन्ह सौंपा था। उन्होंने दावा किया कि विधायकों की अपात्रता के निर्णय से पहले ही चुनाव आयोग द्वारा पार्टी चिन्ह का फैसला सुनाए जाने के कारण बाद की पूरी कानूनी प्रक्रिया पर विपरीत असर पड़ा है।
सुनवाई के दौरान कामत ने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि इस संवेदनशील मामले में बहुत अधिक समय बर्बाद हो गया। इस अत्यधिक देरी के कारण शिंदे गुट के विधायकों ने दलबदल का पूरा राजनीतिक लाभ पहले ही उठा लिया है।
उन्होंने कहा कि भले ही आज की तारीख में भौतिक रूप से इस पर तुरंत कोई राहत लागू करना संभव न हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट आज भी एक स्पष्ट कानूनी निष्कर्ष दे सकता है कि ये विधायक किस विशेष तारीख से अपात्र हुए थे। जिस दिन उन्होंने पार्टी विरोधी काम किया, उसी दिन से उनका सदस्य होने का अधिकार समाप्त हो चुका था।
कामत ने आरोप लगाया कि विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने इस अयोग्यता याचिका के विषय को उचित और निष्पक्ष तरीके से नहीं संभाला। सुभाष देसाई मामले का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ठाकरे गुट का विधानसभा अध्यक्ष की निष्पक्षता पर से विश्वास उठ चुका था, जिसके कारण उन्होंने सीधे सर्वोच्च न्यायालय से ही निर्णय लेने की मांग की थी।
इस मामले में फैसला आने में कई महीने लग गए और ठाकरे गुट को दो बार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा, जिसके बाद जनवरी 2024 में जाकर जैसे-तैसे निर्णय आ सका। कामत ने दलील दी कि जहां न्याय की पूर्ति करनी हो और विधानसभा का कार्यकाल सीमित बचा हो, वहां मामले को वापस अध्यक्ष के पास भेजना न्यायसंगत नहीं होगा।
अपनी दलीलों को कानूनी रूप से अभेद्य बनाने के लिए देवदत्त कामत ने उत्तर प्रदेश के बेहद चर्चित राजेंद्र सिंह राणा मामले का उदाहरण कोर्ट के सामने रखा। उन्होंने बताया कि उस मामले में दलबदल करने वाले विधायक मंत्री बन गए थे और विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने वाला था।
तब सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष के फैसले का इंतजार करने या मामले को वापस नीचे भेजने के बजाय, खुद ही उन सदस्यों को पिछली तारीख से अपात्र घोषित कर दिया था ताकि संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) को निष्प्रभ होने से बचाया जा सके। कामत ने कहा कि वर्तमान मामले में भी ठीक वैसी ही असाधारण परिस्थितियां हैं, जहां सुप्रीम कोर्ट को सीधे फैसला लेना चाहिए।
कामत ने स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं के पार्षदों की अपात्रता से जुड़े मामलों का भी हवाला दिया। उन्होंने बताया कि कई मामलों में सक्षम प्राधिकारियों ने अयोग्यता की याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन हाई कोर्ट ने अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए खुद उन सदस्यों को अपात्र घोषित किया था, और सुप्रीम कोर्ट ने भी उस फैसले को बरकरार रखा था।
कामत का निष्कर्ष यह था कि चूंकि आज सभी पक्षकार और उनके कानूनी प्रतिनिधि अदालत के सामने मौजूद हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को खुद ही इन विधायकों की अपात्रता पर अंतिम और ऐतिहासिक फैसला सुनाना चाहिए।