Uddhav Thackeray MPs Defection: महाराष्ट्र में शिवसेना के भीतर साल 2022 में हुई ऐतिहासिक बगावत के बाद, अब साल 2026 में एक बार फिर 'ऑपरेशन टाइगर' के जरिए उद्धव ठाकरे को उनके राजनीतिक जीवन का सबसे करारा झटका देने की तैयारी चल रही है।
एक प्रमुख दैनिक समाचार पत्र की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में रविवार 7 जून को एकनाथ शिंदे ने खुद ठाकरे गुट के इन असंतुष्ट सांसदों के साथ एक बेहद गोपनीय बैठक की, जिसमें दल-बदल की सभी बारीकियों और कानूनी अड़चनों को दूर करने की पूरी योजना तैयार कर ली गई है। इस गुप्त बैठक के बाद दिल्ली से लेकर मुंबई तक का सियासी पारा अचानक बेहद गर्म हो गया है और ठाकरे गुट के भीतर अंतर्विरोध खुलकर सामने आने लगे हैं।
इस पूरी सियासी बगावत की शुरुआत कुछ दिनों पहले ही हो गई थी, जब दिल्ली में केंद्रीय मंत्री प्रतापराव जाधव के सरकारी बंगले पर ठाकरे गुट के कुछ सांसदों को देखा गया था। हालांकि, उस समय भारतीय जनता पार्टी (BJP) के शीर्ष नेतृत्व ने इस मामले पर थोड़ी सावधानी बरतने और जल्दबाजी में कोई भी कदम न उठाने की सलाह दी थी। लेकिन रविवार को शिंदे और इन सांसदों के बीच हुई आमने-सामने की मुलाकात के बाद अब यह साफ हो गया है कि सांसदों के बगावत का काउंटडाउन शुरू हो चुका है और वे किसी भी वक्त बड़ा फैसला ले सकते हैं।
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अंदरूनी सूत्रों से मिल रही खबरों के अनुसार, शिंदे की शिवसेना में शामिल होने जा रहे सात सांसदों में से एक को पुरस्कार के रूप में केंद्र सरकार में कैबिनेट या राज्यमंत्री का पद सौंपा जा सकता है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि मराठवाड़ा क्षेत्र से आने वाले एक कद्दावर सांसद को यह बड़ा अवसर मिलने वाला है। वहीं दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे के प्रति वफादारी निभाने वाले जो दो सांसद इस बगावत का हिस्सा नहीं बन रहे हैं, वे दोनों मुंबई महानगरीय क्षेत्र से चुनकर आए हैं, जो शिंदे गुट के इस 'ऑपरेशन टाइगर' से पूरी तरह दूर हैं।
इस संभावित टूट की पुष्टि तब और मजबूती से हुई जब मीडिया प्रतिनिधियों ने शिरडी लोकसभा सीट से ठाकरे गुट के सांसद भाऊसाहेब वकचौरे को घेर लिया। शिंदे गुट के साथ संपर्कों को लेकर पूछे गए सीधे सवालों पर वकचौरे ने इन खबरों का खंडन करने के बजाय हाथ जोड़ लिए। उन्होंने कैमरे के सामने केवल इतना कहा, "इस बारे में सवाल मत पूछिए। चुप रहना ही इस समय सबसे अच्छा तरीका है।" सांसद की इस सांकेतिक चुप्पी और अफवाहों का सीधे तौर पर खंडन न करने की वजह से अब राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि ठाकरे गुट के सांसदों का जाना लगभग तय हो चुका है।