हाई कोर्ट ने तपन जायसवाल के खिलाफ FIR, चार्जशीट और केस रद्द किया।
साहूकारी लाइसेंस वैध मिला, FIR दर्ज कराने में 5 साल की देरी।
मजिस्ट्रेट की अनुमति बिना जांच को अदालत ने कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग माना।
Maharashtra Tapan Jaiswal Money Lending: शिकायतकर्ता विमल कालमेघ की ओर से प्रतापनगर थाना में दर्ज शिकायत के अनुसार पुलिस ने तपन जायसवाल के खिलाफ साहूकारी विनियमन कानून के तहत मामला दर्ज किया। पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर और चार्जशीट को रद्द करने की मांग करते हुए तपन जायसवाल ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
इस पर सुनवाई के बाद न्यायाधीश एमडब्ल्यू चांदवानी ने एफआईआर, चार्जशीट और आपराधिक मामले की कार्यवाही को पूरी तरह निरस्त कर दिया। याचिकाकर्ता की ओर से अधि, एसपी धर्माधिकारी और अधि। एसपी सोनवने ने पैरवी की। अदालत ने आदेश में कहा कि वैधानिक सीमाओं और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए बिना शुरू की गई यह आपराधिक कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। नगर संवाददाता।
शिकायतकर्ता विमल दिनेश कालमेघ ने आरोप लगाया था कि दिसंबर 2013 में उनके बेटे राहुल कालमेघ ने अपने घर के निर्माण के लिए 17.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर पर 2,50,000 रुपये का कर्ज लिया था। शिकायत के अनुसार, 35,000 रुपये ब्याज काटकर 2,15,000 रुपये का भुगतान किया गया था। बाद में व्याज और मूल राशि की वसूली के लिए दबाव बनाया गया, मारपीट की गई, पिस्टल दिखाकर धमकी दी गई और जबरन प्लॉट की रजिस्ट्री करवा ली गई।
शुरुआती जांच में पुलिस ने आईपीसी की गंभीर धाराओं और आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया था। हालांकि जांच के दौरान पुलिस को इन गंभीर आरोपों में कोई सच्चाई या सबूत नहीं मिला। पुलिस जांच में यह सामने आया कि जिस अवधि में अपहरण और मारपीट की घटनाएं होने का दावा किया गया था, उस समय शिकायतकर्ता का बेटा एक अन्य अपराध के सिलसिले में पुलिस हिरासत में था। इसके बाद पुलिस ने आईपीसी और आर्म्स एक्ट की धाराएं हटा दीं और केवल महाराष्ट्र साहूकारी अधिनियम की धाराओं के तहत चार्जशीट दाखिल की।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने फैसले में कहा कि महाराष्ट्र साहूकारी (विनियमन) अधिनियम, 2014 की धारा 39 (बिना लाइसेंस साहूकारी) का अपराध नहीं बनता क्योंकि याचिकाकर्ता के पास प्रासंगिक अवधि का सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी वैध साहूकारी लाइसैस मौजूद था।
धारा 45 (उत्पीडन) के संबंध में अदालत ने कहा कि कथित अंतिम घटना 21 मार्च 2015 को हुई थी, जबकि एफआईआर 5 वर्ष से अधिक की देरी से 31 जुलाई 2020 को दर्ज कराई गई। Cr।P।C। की धारा 468 के अनुसार 2 साल तक की सजा वाले अपराधों में संज्ञान लेने की समय सीमा 3 वर्ष निर्धारित है, इसलिए यह मामला समय सीमा से बाधित था।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 43, 44 और 46 गैर-संज्ञेय अपराध हैं। पुलिस ने Cr।P।C। की धारा 155(2) के तहत सक्षम मजिस्ट्रेट से अनिवार्य अनुमति लिए बिना जांच की जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल' मामले में स्थापित कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ है। इन सभी कानूनी खामियों को देखते हुए अदालत ने 11वें संयुक्त सिविल जज (जूनियर डिवीजन) एवं प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित आपराधिक मामले को रद्द कर दिया।