Baramati-Rahuri Bypoll: महाराष्ट्र की राजनीति में इस वक्त जबरदस्त हलचल मची हुई है। पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार के निधन के बाद खाली हुई बारामती और राहुरी विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव ने महाविकास अघाड़ी (MVA) के भीतर दरारें पैदा कर दी हैं। सूत्रों के मुताबिक, शिवसेना (UBT) के भीतर इन सीटों को लेकर दो अलग-अलग विचारधाराएं आपस में टकरा रही हैं। 'मातोश्री' में हुई हालिया बैठक में नेताओं के बीच इस मुद्दे पर तीखी बहस हुई, जिससे गठबंधन की एकजुटता पर सवालिया निशान खड़ा हो गया है।
विवाद का मुख्य केंद्र बारामती सीट है। अजित पवार की पत्नी और मौजूदा उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार को निर्विरोध जीत दिलाने के पक्ष में पार्टी का एक गुट खड़ा है। इस गुट का तर्क है कि महाराष्ट्र की राजनीतिक परंपरा के अनुसार, किसी बड़े नेता के निधन के बाद उपचुनाव निर्विरोध होने चाहिए। साथ ही, उद्धव ठाकरे और पवार परिवार के पुराने रिश्तों को देखते हुए यह एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी। हालांकि, पार्टी का दूसरा गुट इस बात पर अड़ा है कि विपक्षी दल होने के नाते उन्हें अपना उम्मीदवार उतारना चाहिए, वरना कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरेगा।
सिर्फ बारामती ही नहीं, राहुरी उपचुनाव को लेकर भी शिवसेना (UBT) के भीतर खींचतान जारी है। ठाकरे सेना के एक आक्रामक गुट का मानना है कि अगर शरद पवार की पार्टी या कांग्रेस वहां से पीछे हटती है, तो शिवसेना को अपना उम्मीदवार जरूर खड़ा करना चाहिए। बताया जा रहा है कि पार्टी के तीन बड़े नेता राहुरी से चुनाव लड़ने की इच्छा जता चुके हैं। इस बीच, कांग्रेस ने पहले ही अकेले चुनाव लड़ने के संकेत दे दिए हैं, जिससे एमवीए के भीतर 'ऑल इज वेल' वाली स्थिति अब नजर नहीं आ रही है।
पार्टी के भीतर मचे इस घमासान पर सांसद संजय राउत ने संभलकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि बारामती और राहुरी दोनों सीटें तकनीकी रूप से शरद पवार की पार्टी की हैं, इसलिए अंतिम फैसला उन्हीं को लेना है। हालांकि, राउत ने यह भी साफ कर दिया कि सुनेत्रा पवार ने उद्धव ठाकरे से बात जरूर की है, लेकिन उद्धव जी ने अभी तक निर्विरोध चुनाव को लेकर कोई सार्वजनिक वादा नहीं किया है। राउत का मानना है कि सरकार से नाराज मतदाताओं के लिए चुनाव न कराना एक तरह का अन्याय होगा।
महाराष्ट्र की जनता फिलहाल असमंजस में है। एक तरफ अजित पवार के निधन के प्रति गहरी सहानुभूति है, तो दूसरी तरफ सत्ता और विपक्ष की अपनी मजबूरियां। अगर ठाकरे सेना चुनावी मैदान से पीछे हटती है, तो इसका सीधा फायदा महायुति को होगा। वहीं, शरद पवार की चुप्पी ने इस मामले को और भी रहस्यमयी बना दिया है। अब सबकी नजरें उद्धव ठाकरे के आधिकारिक फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि बारामती में 'परंपरा' की जीत होगी या 'लोकतंत्र' की जंग जारी रहेगी।