हिंगोली में 172वें सार्वजनिक दशहरा उत्सव की शुरुआत सोर्स: सोशल मीडिया
हिंगोली

हिंगोली का 172वां ऐतिहासिक दशहरा: जब ब्रिटिश छावनी के सैनिकों को आई घर की याद, जानिए कैसे शुरू हुई परंपरा

Hingoli Dussehra Festival: देश का दूसरा सबसे बड़ा दशहरा महाराष्ट्र के हिंगोली में मनाया जाता है। अंग्रेजों के जमाने से शुरू हुआ यह 15 दिवसीय उत्सव पूरी तरह जनता के सहयोग और आपसी भाईचारे की मिसाल है।

आकाश मसने

Highlights

  • नवरात्रि के पहले दिन हुई हिंगोली के 172वें ऐतिहासिक सावर्जनिक दशहरे की शुरुआत।

  • साल 1855 में ब्रिटिश काल की सैन्य छावनी से शुरू हुआ हिंगोली दशहरा उत्सव।

  • इस महोत्सव का आयोजन किसी राजा या बड़े स्पॉन्सर का पैसा नहीं, बल्कि जनता के स्वैच्छिक योगदान से होता है।

  • नवरात्रि से शुरू होकर विजयादशमी के बाद तक 15 दिन चलता है यह उत्सव।

Hingoli Dussehra Festival 172-Year History: जब भी भारत में भव्य दशहरा समारोहों की बात होती है, तो सबसे पहला नाम कर्नाटक के मैसूर दशहरे का आता है। मैसूर का यह वैभवशाली उत्सव सदियों से वहां के यदुवीर राजघराने के संरक्षण और शाही ठाट-बाट के लिए जाना जाता है। लेकिन मैसूर के ठीक बाद, देश का दूसरा सबसे बड़ा और महाराष्ट्र का सबसे भव्य दशहरा महोत्सव किसी महल की चहारदीवारी या शाही खजाने के दम पर नहीं, बल्कि पूरी तरह से आम जनता के 'लोकाश्रय' पर खड़ा है?

हम बात कर रहे हैं महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में स्थित हिंगोली के ऐतिहासिक सार्वजनिक दशहरा महोत्सव की। करीब 170 से भी अधिक वर्षों से चली आ रही यह परंपरा इस बात का साक्षात प्रमाण है कि जब जनता किसी संस्कृति को अपने हाथों में लेती है, तो वह राजघरानों के वैभव को भी टक्कर दे सकती है।

हिंगोली के 172वें सार्वजनिक दशहरा उत्सव की भव्य शुरुआत

हिंगोली का ऐतिहासिक दशहरा उत्सव रविवार को बड़े उत्साह के साथ शुरू हुआ। परंपरा, संस्कृति और भक्ति के माहौल के बीच, गणमान्य व्यक्तियों द्वारा भगवान हनुमान की पूजा के साथ सार्वजनिक दशहरा उत्सव का उद्घाटन किया गया।

इसके बाद शहर में एक भव्य जुलूस निकाला गया, जिसमें ढोल-ताशे की गूंज और चारों ओर खुशी का माहौल था। साथ ही, गणमान्य व्यक्तियों द्वारा एक कृषि और औद्योगिक प्रदर्शनी का भी उद्घाटन किया गया। 1855 से चली आ रही एक ऐतिहासिक परंपरा का इस साल 172वां वर्ष है।

सैनिकों को घर की कमी खलने से पड़ी हिंगोली दशहरे की नींव

हिंगोली दशहरे की नींव साल 1855 के आसपास ब्रिटिश काल में पड़ी थी। उस समय हिंगोली अंग्रेजों और हैदराबाद के निजाम की एक बेहद महत्वपूर्ण सैन्य छावनी हुआ करता था। यहां ब्रिटिश सेना की हैदराबाद कंटिंगेंट तैनात थी, जिसमें उत्तर प्रदेश, बिहार और पंजाब के बड़ी संख्या में सैनिक शामिल थे।

रामलीला का मंचन और रावण दहन की शुरुआत

त्योहारों के दिनों में इन सैनिकों को अपने घर और वहां की पारंपरिक रामलीला की भारी कमी खलती थी। सैनिकों की इसी सांस्कृतिक ललक को भांपकर स्थानीय संत मानदास बाबा ने उन्हें प्रेरित किया। इसके बाद सैनिकों और स्थानीय नागरिकों ने मिलकर रामलीला का मंचन और रावण दहन की शुरुआत की। जो कारवां कुछ सैनिकों की टोली से शुरू हुआ था, वह आज एक विशाल सार्वजनिक महोत्सव का रूप ले चुका है।

बिना राजा के कैसे संभलता है देश का दूसरा सबसे बड़ा मेला?

शाही दशहरों में सरकारी फंड और राजघरानों का सीधा नियंत्रण होता है, लेकिन हिंगोली की कहानी बिल्कुल अलग है। यहां साल 1950 में स्थानीय व्यापारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने मिलकर 'सार्वजनिक दसरा महोत्सव समिति' का गठन किया। इसके बाद साल 1955 में जब इस उत्सव को 100 साल पूरे हुए तब रामलीला मैदान में एक स्थायी 'दसरा स्तंभ' का निर्माण किया गया।

हिंगोली शहर में आयोजित इस मेले का पूरा खर्च किसी एक बड़े स्पॉन्सर या सरकारी अनुदान से नहीं, बल्कि लोकवर्गणी यानी जनता के स्वैच्छिक योगदान से चलता है। शहर का छोटा दुकानदार हो या बड़ा व्यापारी, हर कोई इस उत्सव को सफल बनाने के लिए अपनी जेब खोलता है।

वर्तमान में इस व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए स्थानीय दशहरा समिति और जिला प्रशासन मिलकर काम करते हैं। यहां तक कि मेले की जमीन और झूलों की नीलामी से होने वाली आय को भी इसी उत्सव के भव्य आयोजन में लगा दिया जाता है।

हिंगोली के रामलीला मैदान में स्थायी दसरा स्तंभ

15 दिन चलता है हिंगाेली दशहरा उत्सव

शाही महलों के दशहरे में जहां प्रोटोकॉल और औपचारिकताएं होती हैं, वहीं हिंगोली का रामलीला मैदान पूरी तरह से सामाजिक समरसता का प्रतीक बन जाता है। इस मेले की सबसे बड़ी खूबसूरती इसका कौमी एकता है। नवरात्रि से लेकर विजयादशमी के बाद तक चलने वाले इस 15 दिवसीय मेले में हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं। दुकानें सजाने से लेकर झूलों के प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था तक में हर मजहब के लोगों की भागीदारी होती है।

विजयादशमी के दिन जब आसमान रंग-बिरंगी आतिशबाजी से नहा उठता है और 51 से 52 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन होता है, तब रामलीला मैदान में मराठवाड़ा और विदर्भ के कोने-कोने से आए लाखों लोगों की आंखें एक साथ उस दृश्य को निहार रही होती हैं। इसके अगले दिन होने वाला ऐतिहासिक कुश्ती दंगल और पारंपरिक पाड़ों (भैंसों) की लड़ाई का रोमांच इस जन-उत्सव को पूर्णता देता है।

मानदास बाबा के सम्मान में फोड़ा जाता है नारियल

नवरात्रि के पहले दिन इस उत्सव की शुरुआत मानदास बाबा के सम्मान में नारियल फोड़कर और उनका आशीर्वाद लेकर की जाती है, ताकि पूरा उत्सव शांतिपूर्वक और आनंद के साथ संपन्न हो सके।

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