संजय तिवारी sanjay।tiwari@navabharat।com
महाराष्ट्र में लोकसभा का चुनाव खत्म होते ही कम वोटिंग को लेकर अब राजनीतिक दल और उनके कार्यकर्ताओं की नींद उड़ी है, खासकर सत्तारूढ़ दल की नींद ज्यादा खराब हो गई है। लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव के साथ महाखिलवाड़ किसने किया, इसकी जांच होनी जरूरी भी थी। वैसे इस जांच में निकलेगा क्या, इसको लेकर कई तरह के तर्क-वितर्क लगाए जा रहे हैं, लेकिन जांच तो होनी ही चाहिए। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने इस मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए राज्य के मुख्य सचिव नितिन करीर को वोटिंग के दौरान हुई अव्यवस्था की जांच के आदेश दिए हैं। जांच अधिकारी सभी पहलुओं की जांच तो करेंगे ही, लेकिन इस बात की भी जांच होनी चाहिए कि महाराष्ट्र भर में घोर लापरवाही के लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं?
चुनाव आयोग पर कम हुआ भरोसा
राज्य में वोटिंग के दौरान जिस तरह की परेशानी जनता को झेलनी पड़ी, उसे देखकर लगता है कि चुनाव आयोग ही इस मुद्दे को लेकर गंभीर नहीं है। चुनाव आयोग अपने आप में एक स्वायत्त संस्था है। उसका काम ही पारदर्शी और निष्पक्ष चुनाव कराना है। जिस तरह से दुनिया के कई मुल्कों में चुनाव आयोग अब सिर्फ दिखावे की वस्तु रह गया है, वैसी ही प्रतिमा अब अपने यहां भी होने लगी है। देखा जाए तो 5 साल में एक बार होने वाले चुनाव को सही तरीके से कराने के लिए आयोग के पास काफी समय रहता है। लेकिन ऐसा लग रहा है कि सत्तारूढ़ दल की कठपुतली बनने में उसके अधिकारियों का इतना ज्यादा समय जा रहा है कि उसे ध्यान ही नहीं कि मतदाताओं के प्रति उसका दायित्व क्या है।
आसान हो वोटिंग, सुचारु हो व्यवस्था
चुनाव के नाम पर बड़ी-बड़ी बैठक लेना, सुबह से शाम तक कामकाजी अफसरों को अनावश्यक काम में लगाकर रखना, कभी शिक्षकों को तो कभी अन्य सरकारी कर्मचारियों को वोटिंग लिस्ट बनाने में लगाना, इस तरह दिखाया जाता है कि पूरा तंत्र बहुत ही पसीना बहा रहा है। लेकिन इन सबके बाद भी जब ठीक से वोटिंग तक नहीं हो पा रही है तो क्या समझा जाए? ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि मतदाता जहां है, वहां से वह वोट डाल सके। एक तरफ हमने अधिकांश सरकारी योजनाओं को आधार से जोड़कर सब कुछ ऑनलाइन कर दिया है। उदाहरण स्वरूप 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन दिए जाने का सरकारी दावा किया जा रहा है तो क्या हम वोटरों की लिस्ट को सही तरीके से तैयार नहीं कर सकते? ऐसा कब तक चलता रहेगा? आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में जब पूरा काम डाटा के भरोसे ही चलना है तो हम कागजी वोटिंग लिस्ट और सुविधाहीन मतदान केंद्र बनाकर किस तरह की खोखली व्यवस्था बनाने में जुटे हैं? जनता के खून-पसीने की कमाई का एक बड़ा हिस्सा, जो अरबों रुपये के • करीब होता है। क्या सिर्फ मनमाने ढंग से खर्च करना चाहिए?
शत प्रतिशत वोटिंग नहीं, सिर्फ शोबाजी
आयोग के शीर्ष अधिकारी सिर्फ शोबाजी में ही लगे हुए हैं। उनकी अहम जिम्मेदारी है कि देश में शत प्रतिशत वोटिंग कराई जाए। सभी की वोटिंग आराम से हो, यह सुनिश्चित करना भी आयोग की जिम्मेदारी है। हो रहा है इसके ठीक विपरीत! शत प्रतिशत वोटिंग के लिए काम करना छोड़कर आयोग, उसके आयुक्त और शीर्ष अधिकारी सिर्फ 'चमकोगिरी' में लगे रहते हैं। लोकतंत्र तब तक ही मजबूती से टिका रह सकता है जब उसके सबसे बड़े स्टेक होल्डर मतलब आम जनता की सहभागिता उसमें समान रूप से बनी रहे। यह सहभागिता तभी हो सकती है जब हर व्यक्ति आसानी से वोट डाले। ऐसे में जब महाराष्ट्र की वोटिंग लिस्ट में लाखों लोगों के नाम गायब होने की घटना उजागर हुई तो क्या इसके लिए किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा? क्या ऐसी व्यवस्था तैयार नहीं की जा सकती कि एक सामान्य मतदाता यदि वह भारत का नागरिक है तो उसको जीवित होना और उसके पास आधार कार्ड होना ही वोट देने के लिए पर्याप्त है। यह छोड़कर आयोग के अधिकारी इस काम में लगे रहते हैं कि किस तरह आम आदमी को पहचान- पत्र के नाम पर इतना हलाकान कर दिया जाए कि वोट डालने से उसका मन ही उचट जाए।
राजनीतिक दल भी सिर्फ लाठी न पीटें
सही तरीके से चुनाव हो, शत प्रतिशत वोटिंग हो और मतदाताओं को कोई भी तकलीफ नहीं हो, यह जिम्मेदारी जितनी चुनाव आयोग की है, उससे कहीं ज्यादा राजनीतिक दलों की भी बनती है। सांप निकल जाने के बाद लाठी पीटने के लिए तो कई लोग तैयार हो जाते हैं, लेकिन समय पर कोई खड़ा नहीं होता। राजनीतिक दलों की बात करें तो उनकी ओर से 'पन्ना प्रमुखों' तक का दावा किया जाता है, लेकिन जिस पार्टी ने यह दावा किया, अब उसके लोग ही कम वोटिंग का रोना रो रहे हैं। नेताओं को यह समझना होगा कि उनका भविष्य तब तक ही सुरक्षित है जब तक देश में डा। बाबासाहब आम्बेडकर का बनाया हुआ संविधान और लोकतंत्र सही-सलामत है। एक-एक करके संवैधानिक संस्थाओं को या तो नष्ट किया जा रहा है या उसका अस्तित्व ही खत्म किया जा रहा है। अब चुनाव आयोग की बारी है।