हाईकोर्ट (फोटो नवभारत)
छत्रपति संभाजीनगर

फाइल सात दिन में निपटनी थी, 25 साल तक नहीं हुआ फैसला; छत्रपति संभाजीनगर खंडपीठ ने पूछा जवाब

Government File Delays: सरकारी आवेदनों पर वर्षों तक फैसला नहीं होने से हाईकोर्ट में हर साल 7-8 हजार याचिकाएं दाखिल हो रही हैं। 25 साल पुराना आवेदन सामने आने पर कोर्ट ने सुओ मोटो PIL ली।

आलोक उमाकृष्ण

Chhatrapati Sambhajinagar News: सरकारी कार्यालयों में नागरिकों के आवेदन, प्रस्ताव और निवेदन वर्षों तक लंबित रहने की गंभीर स्थिति अब हाईकोर्ट के सामने भी चिंता का विषय बन गई है।

स्थिति यह है कि मुंबई हाईकोर्ट की छत्रपति संभाजीनगर खंडपीठ में हर साल दाखिल होने वाली करीब 18 से 19 हजार याचिकाओं में से 7 से 8 हजार याचिकाएं केवल सरकार को लंबित आवेदनों पर निर्णय लेने का निर्देश देने के लिए दाखिल की जा रही हैं। सरकारी कामकाज में हो रही इस दिरंगाई का न्यायालय ने स्वयं संज्ञान लेते हुए सुओ मोटो जनहित याचिका दर्ज की है।

25 साल पुराना आवेदन भी नहीं हुआ मंजूर

सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली में व्याप्त दिरंगाई की गंभीरता सामने लाने के लिए खंडपीठ ने कई मामलों का उल्लेख किया। लातूर के एक मामले में भूमि अधिग्रहण का मुआवजा बढ़ाने की मांग को लेकर 31 मई 1999 को आवेदन किया गया था। यह आवेदन 25 वर्ष बीतने के बाद भी लंबित रहा।

इसी तरह एक अन्य मामले में सामाजिक न्याय विभाग के सचिव के पास 4 सितंबर 2018 से प्रस्ताव लंबित होने की जानकारी सामने आई। न्यायमूर्ति नितिन बी. सूर्यवंशी और न्यायमूर्ति बाबासाहेब डी. शिंदे की खंडपीठ ने सरकारी कामकाज में हो रही इस देरी को गंभीरता से लेते हुए मामले की सुनवाई शुरू की है।

कानून में सात दिन की समयसीमा

सरकारी कामकाज में अनावश्यक देरी रोकने के लिए राज्य सरकार ने वर्ष 2005 में कानून बनाया था, जो 1 जुलाई 2006 से लागू हुआ। इसके अनुसार किसी भी सरकारी फाइल को सात दिन से अधिक समय तक लंबित नहीं रखा जा सकता। अति आवश्यक फाइल का निपटारा उसी दिन अथवा अगले दिन सुबह तक, जबकि महत्वपूर्ण फाइल चार दिन में निपटारा करना अपेक्षित है।

वहीं, अन्य विभाग की मंजूरी की आवश्यकता नहीं होने वाले मामलों में अधिकतम 45 दिन में निर्णय लेना जरूरी है। दूसरे विभाग की सहमति आवश्यक होने पर भी तीन महीने के भीतर निर्णय करना अनिवार्य है। जानबूझकर देरी अथवा लापरवाही करने वाले कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान भी कानून में किया गया है।

दो दशक बाद भी प्रभावी अमल पर सवाल

कानून लागू हुए करीब दो दशक बीत जाने के बावजूद सरकारी कार्यालयों में इसका प्रभावी पालन नहीं होने पर खंडपीठ ने सवाल उठाए हैं। न्यायालय ने राज्य सरकार से यह जानकारी मांगी है कि क्या नागरिकों के अधिकारों और सेवाओं को लेकर नागरिक सनद तैयार की गई है और क्या संबंधित कानून के अनुसार प्रशासनिक ऑडिट किया गया है।

खंडपीठ ने सरकारी वकील को इस संबंध में रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। इस सुओ मोटो जनहित याचिका में न्यायालय की सहायता के लिए अधिवक्ता एस. एस. बोरा को न्याय मित्र नियुक्त किया गया है।

सात दिन का नियम, इंतजार 25 साल का

सरकारी फाइल सात दिन से अधिक लंबित नहीं रखने की कानूनी व्यवस्था के बावजूद नागरिकों को वर्षों तक निर्णय का इंतजार करना पड़ रहा है। 25 वर्ष पुराने आवेदन का मामला सामने आने से सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही और समयबद्ध निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

अब हाईकोर्ट की निगाह इस बात पर है कि दिरंगाई रोकने के लिए बनाए गए कानून का सरकारी विभागों में वास्तविक रूप से कितना पालन हो रहा है।

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