मुंबई उच्च न्यायालय की छत्रपति संभाजीनगर पीठ सोर्स: सोशल मीडिया
छत्रपति संभाजीनगर

छत्रपति संभाजीनगर में मां के निधन के बाद नाना के पास रह रही बच्ची पिता को मिलेगी, हाईकोर्ट का अहम फैसला

Sambhajinagr Father Custody Rights Child Welfare:संभाजीनगर हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्ची को 15 दिनों में पिता के सुपुर्द करने का आदेश दिया।नाना को हर रविवार दोपहर 12 से शाम 4 बजे तक मिलने की अनुमति दी गई।

मनीषा बोंदरे

Highlights

  • मुंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद पीठ ने नाना की अपील खारिज की।

  • 15 दिनों के भीतर बच्ची को पिता के सुपुर्द करने का आदेश।

  • बच्ची के कल्याण को निर्णय में सर्वोच्च महत्व दिया गया।

  • नाना को हर रविवार चार घंटे बच्ची से मिलने की अनुमति।

  • जालना परिवार न्यायालय के फैसले को नाना ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

Chatrapati Sambhajinagr High Court Child Custody Case: मुंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद पीठ ने नाबालिग बच्ची के संरक्षण को लेकर नाना की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने 15 दिनों के भीतर बच्ची को पिता के सुपुर्द करने का आदेश दिया। साथ ही नाना को हर रविवार दोपहर 12 से शाम 4 बजे तक बच्ची से मिलने की अनुमति दी है।

बच्ची के संरक्षण पर हाईकोर्ट का फैसला

छत्रपति संभाजीनगर, मां के निधन के बाद नाना के पास रह रही नाबालिग बच्ची के संरक्षण को लेकर मुंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद पीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति संदीप कुमार सी. मोरे और न्यायमूर्ति वैशाली पाटील-जाधव की पीठ ने नाना की अपील खारिज करते हुए बच्ची को 15 दिनों के भीतर पिता के सुपुर्द करने का आदेश दिया।

हालांकि, अदालत ने बच्ची और नाना के बीच संबंध बनाए रखने के लिए उन्हें प्रत्येक रविवार दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक उससे मिलने की अनुमति दी है।

बच्ची का कल्याण सर्वोपरि

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 6 और संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 की धारा 17 के प्रावधानों पर विचार किया। अदालत ने बच्ची के कल्याण को सर्वोच्च महत्व दिया।

पीठ ने स्पष्ट किया कि मां के निधन के बाद कुछ समय तक बच्ची का नाना के पास रहना मात्र प्राकृतिक संरक्षक पिता के अधिकार को समाप्त नहीं करता। बच्ची के हितों को ध्यान में रखते हुए उसके संरक्षण के संबंध में निर्णय लिया गया।

मां के निधन के बाद शुरू हुआ विवाद

जानकारी के अनुसार, विवाह के बाद दंपति के यहां बेटी का जन्म हुआ था। जन्म के कुछ ही दिनों बाद हृदयाघात से मां का निधन हो गया। अंतिम संस्कार और अन्य धार्मिक विधियां पूरी होने तक पिता ससुराल में ही रहे।

इसके बाद उन्होंने बेटी को अपने साथ ले जाने की इच्छा जताई। ससुराल पक्ष के आग्रह पर पिता ने बच्ची को कुछ समय तक वहीं रहने दिया। बाद में बच्ची को सौंपने से इनकार किए जाने पर उन्होंने जालना परिवार न्यायालय में याचिका दायर की।

परिवार न्यायालय के आदेश को दी चुनौती

जालना परिवार न्यायालय ने 30 जून 2025 को बच्ची को 60 दिनों के भीतर पिता के संरक्षण में सौंपने का आदेश दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए नाना ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। हाईकोर्ट ने अब अपील खारिज करते हुए बच्ची को 15 दिनों के भीतर पिता के सुपुर्द करने का निर्देश दिया है।

नाना की ओर से अधिवक्ता भूषण वी. विर्घ, जबकि पिता की ओर से अधिवक्ता किरण डी. जाधव और वी. एल. भंगे ने पक्ष रखा।

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