प्रतीकात्मक तस्वीर (सोर्स: सोशल मीडिया ) 
औरंगाबाद

संभाजीनगर मनपा: 5 साल बाद चुनी हुई सत्ता की वापसी, 22 में 18 बार शिवसेना का महापौर

Sambhajinagar Mayor: मनपा चुनाव के बाद संभाजीनगर में करीब पौने पांच साल का प्रशासक राज खत्म होगा। राजनीतिक इतिहास में अब तक 22 महापौरों में 18 बार शिवसेना का वर्चस्व रहा है।

अंकिता पटेल

Maharashtra Municipal History: छत्रपति संभाजीनगर मनपा चुनाव व परिणामों के बाद करीब पौने पांच वर्ष का प्रशासक राज खत्म होकर शहर को नया महापौर मिलने जा रहा है। स्थानीय निकाय के राजनीतिक इतिहास पर नजर डाली जाए, तो पता चलता है कि सबसे लंबे समय तक शिवसेना-भाजपा गठबंधन का वर्चस्व रहा है।

प्रारंभिक पांच वर्षों के प्रशासनिक कार्यकाल को छोड़ दें, तो अब तक हुए 22 महापौरों में से 18 बार शिवसेना व 4 बार भाजपा के प्रत्याशी महापौर बने हैं। कांग्रेस ने भी 3 बार महापौर के रूप में शीर्ष पद पर काबिज रही है। कांग्रेस के डॉ. शांताराम काले बाद शिवसेना के मोरेश्वर सावे ने महापौर पद संभाला।

जोड़-तोड की राजनीति के चलते वर्ष 1989 में कार्यकाल में 2 महापौरों में विभाजित करना पड़ा। इसके बाद प्रदीप जायसवाल ने सावे से कार्यभार ग्रहण किया, यह मनपा के भीतर सत्ता संतुलन बदलाव की ओर इशारा कर रहा था।

इस दौर में राजनीतिक फोकस मुख्य रूप से विधानसभा चुनावों पर केंद्रित था। इसके बाद शिवसेना-भाजपा गठबंधन का करीब 25 वर्षों तक शहर की राजनीति पर दबदबा रहा। वर्ष 1988 में निर्वाचित निकाय ही 1991 में कार्यरत था व इसके भीतर महापौर का चुनाव हुआ था।

अभी तक 22 उपमहापौरों ने संभाली है कमान

शहर के मनपा में उपमहापौर पद ने हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 1988 से लेकर 2020 तक पर्यटन व उद्योग नगरी को कुल 22 उपमहापौर मिले, जिन्होंने अलग-अलग कार्यकाल में सक्रिय भूमिका निभाई। इस अवधि में अलग-अलग राजनीतिक समीकरण, सत्ता परिवर्तन व गठबंधनों के बीच उपमहापौर पद शहर की राजनीति का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना रहा। पहले उपमहापौर तकी हसन के बाद मनमोहनसिंह ओबेरॉय ओबेरॉय, किशोर थोरात व अजीम खान दादामियां सहित कई वरिष्ठ एवं अनुभवी जनप्रतिनिधियों ने यह जिम्मेदारी संभाली। समय-समय पर महिला नेतृत्व भी सामने आया। वर्ष 2000 के बाद उपमहापौर पद के कार्यकाल अपेक्षाकृत कम अवधि के रहे। नतीजतन, अधिक लोगों को मौके मिल सके।

अपक्ष नगरसेवक अब्दुल रशीद बने थे महापौर

औरंगाबाद संसदीय क्षेत्र से शिवसेना के मोरेश्वर सावे विजयी हुए थे, पर मनपा पर कांग्रेस का राज था। मनमोहन सिंह ओबेरॉय के बाद कांग्रेस के ही अशोक सायन्ना यादव शहर के शीर्ष पद अर्थात महापौर पर आसीन थे।

1995 के चुनावों में शिवसेना-भाजपा की जीत के बाद सुनंदा कोल्हे महापौर बनीं। उस समय राज्य में भी शिवसेना-भाजपा गठबंधन की सरकार बनी थी व उसका असर स्थानीय राजनीति पर भी पड़ा।

औरंगाबाद पश्चिम विधानसभा सीट से शिवसेना के चंद्रकांत खैरे की जीत ने इस प्रभाव को और मजबूत किया। हालांकि, इसके बाद कभी भी कांग्रेस का महापौर नहीं बन सका। नाटकीय मोड़ के बाद अप्रत्याशित तरीके से निर्दलीय नगरसेवक अब्दुल रशीद खान (मामू) 7 मई 1997 से 20 अप्रैल 1998 तक महापौर रहे। उनके बाद फिर महापौर पद शिवसेना का कब्जाया।

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