देवी अहिल्याबाई होल्कर (सौजन्य-सोशल मीडिया) 
अहमदनगर

28 साल का शासन, पर एक को भी नहीं दी सजा-ए-मौत! 18वीं सदी में अहिल्याबाई होल्कर ने ऐसे कायम किया 'रामराज्य'

Lokmata Ahilyabai Holkar Jayanti: आज अहिल्याबाई होल्कर की 301वीं जयंती है। मराठा साम्राज्य की न्यायप्रिय महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने हमेशा अपनी प्रजा के हित के लिए काम किया।

प्रिया जैस

Punyashlok Ahilyabai Holkar History: अहिल्याबाई होल्कर केवल एक नाम नहीं हैं; वे एक विचारधारा, नेतृत्व का एक नया प्रतिमान, सेवा और सदाचार की एक मिसाल, तथा न्याय और जन-कल्याण के प्रति अटूट समर्पण का प्रतीक हैं। अपने पति के निधन के बाद और अपने ससुर की सलाह पर अमल करते हुए अहिल्याबाई होल्कर ने 'सती' प्रथा को अस्वीकार कर दिया और मालवा साम्राज्य की बागडोर अपने हाथों में ले ली। वे अपनी प्रजा के लिए एक न्यायप्रिय और ममतामयी मां के समान थीं। मालवा में महारानी अहिल्याबाई होल्कर का शासन इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है।

यह बात अठाहरवीं शताब्दी की है। महाराष्ट्र के चौंडी गांव में एक छोटे से शिव मंदिर के बाहर एक 8 साल की मासूम बालिका पूरी श्रद्धा के साथ धूल साफ कर रही थी। उसी समय वहां से मराठा साम्राज्य के महान सेनापति और मालवा साम्राज्य के सूबेदार मल्हाक राव होल्कर अपनी सेना के साथ गुजर रहे थे।

अहिल्या का अलौकिक तेज

वे शिव मंदिर के बाहर विश्राम के लिए रुके, जहां उनकी नजर उस बच्ची पर पड़ी। भगवान शिव के प्रति उसकी अटूट श्रद्धा और चेहरे में अलौकिक तेज देख मल्हार राव चौंक गए। उन्होंने तुरंत ही पहचान लिया कि यह कोई साधारण कन्या नहीं है। एक साधारण से धनगर परिवार की बालिका में असाधारण बात देखी। उन्होंने बिना किसी देर के अपने बेटे खांडेराव के लिए उस कन्या का हाथ मांग लिया। यहां से एक साधारण सी कन्या अहिल्या का सफर शुरू हुआ। जिसने आगे चलकर भारत की सबसे महान शासिकाओं में अपना नाम दर्ज करा लिया। महारानी अहिल्याबाई होल्कर के शासनकाल 1767-1795 को आज भी सुनहरे में लिखा गया है।

अहिल्याबाई को दी राजनीतिक शिक्षा

मालवा साम्राज्य की महारानी अहिल्याबाई होल्कर का जन्म महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले (वर्तमान में अहिल्यानगर) के चोंडी गांव में हुआ था। उनके पिता मानकोजी राव शिंदे, इस गांव के पाटिल (मुखिया) थे। विवाह होने के बाद उनकी सास गौतमा बाई ने उन्हें अपनी बेटी की तरह ख्याल रखा और उनकी परवरिश की। इस दौरान उन्होंने अहिल्याबाई को राज्य के बही-खाते और कूटनीति की शिक्षा दी।

उनकी जिंदगी हंसी-खुशी बीत रही थी। लेकिन अचानक एक दिन उनकी खुशियों को ग्रहण लग गया। दरअसल, 1754 में कुम्हेर के युद्ध के दौरान अहिल्या के पति खांडेराव वीरगति को प्राप्त हो गए। तत्कालीन प्रथाओं के अनुसार, उन्हें सती होना था, लेकिन उनके ससुर मल्हार राव ने इसका विरोध किया। उन्होंने रोते हुए अहिल्या का हाथ थामा और कहा, बेटी, अगर तुम भी चली जाओगी तो, यह साम्राज्य कौन संभालेगा? उन्होंने सती बनने जा रही अहिल्या को रोका और मालवा साम्राज्य उन्हें सौंप दिया।

अहिल्याबाई होल्कर (सौजन्य-सोशल मीडिया)

ऐसे बचाया अपना साम्राज्य

1766 में, उनके ससुर मल्हार राव का निधन हो गया, और ठीक एक साल बाद (अप्रैल 1767 में) उनके इकलौते बेटे, मालेराव की भी असमय मृत्यु हो गई। जब साम्राज्य के लालची दीवान (मुख्यमंत्री), गंगाधर यशवंत ने यह मानकर कि वह एक असहाय विधवा हैं, उन्हें किसी वारिस को गोद लेने और सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर करने की साजिश रची, तो अहिल्याबाई ने एक शेरनी की तरह गरजते हुए उसकी चालों को नाकाम कर दिया। उन्होंने पेशवा माधवराव प्रथम को पत्र लिखा, मालवा का सीधा नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया, और इतिहास को एक नई शासक दी।

हर दिन, वह आम लोगों के बीच बैठकर उनकी शिकायतें सीधे सुनती थीं। अठारहवीं सदी के उस दौर में जब न्याय का फैसला केवल तलवार की नोक पर होता था। अहिल्याबाई ने अपने 28 साल के शासनकाल में, एक बार भी किसी को मृत्युदंड नहीं दिया। अपराधियों को केवल जेल में डालने के बजाय, वह उनसे अपना आचरण सुधारने का व्यक्तिगत वचन लेती थीं।

उन्होंने किसानों के लिए '7/12 कृषि योजना' लागू की, जिसके तहत राज्य स्वयं खेती का खर्च उठाता था और उससे होने वाले मुनाफे को किसानों के साथ साझा करता था। अक्टूबर 2024 में, उनके सम्मान में, महाराष्ट्र सरकार ने आधिकारिक तौर पर अहमदनगर जिले का नाम बदलकर 'अहिल्यानगर' कर दिया है।

काशी में अहिल्यादेवी होल्कर की विशाल प्रतिमा

सितंबर 2024 में शुरू की गई 'पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होल्कर महिला स्टार्टअप योजना' आज भी महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के उनके सपने को साकार कर रही है, जिसके तहत ₹25 लाख तक की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। 2025 में, उनकी 300वीं जयंती के अवसर पर, प्रधानमंत्री द्वारा ₹300 मूल्य का एक विशेष स्मारक चांदी का सिक्का जारी किया गया। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के भीतर उनकी एक भव्य प्रतिमा भी स्थापित की गई है।

13 अगस्त 1795 को, जब इस महान आत्मा ने सत्तर वर्ष की आयु में अपनी अंतिम सांस ली, तब तक वह भारतीय इतिहास में केवल एक शासक के दर्जे से कहीं ऊपर उठकर 'लोकमाता' (जनता की मां) और एक 'देवी' का पूजनीय स्थान प्राप्त कर चुकी थीं। आज अहिल्यानगर जिले के श्रीक्षेत्र चौंडी में 30 और 31 मई 2026 को पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होलकर की 301वीं जयंती पर राज्य स्तरीय समारोह आयोजित किया जाएगा।

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