100 Year Old Brinjal Ffarming Sagar: मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड की मिट्टी में खेती की कई ऐसी परंपराएं आज भी जिंदा हैं, जो बदलते दौर में भी किसानों की पहचान बनी हुई हैं। सागर जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर जैसीनगर ब्लॉक का सेमरा गोपाल मन गांव भी ऐसी ही एक खास पहचान के लिए जाना जाता है। यहां करीब 100 साल से एक खास किस्म के देसी कांटेदार बैंगन की खेती की जा रही है, जिसकी लंबाई करीब एक फीट तक होती है।
इस बैंगन की सबसे बड़ी खासियत इसका स्वाद और कम बीज होना है। इसके ऊपरी हिस्से पर मौजूद कांटे इसे सामान्य हाइब्रिड बैंगन से अलग पहचान देते हैं। ग्रामीणों के मुताबिक बाटी के साथ बनने वाले भर्ते के लिए यह बैंगन बेहद पसंद किया जाता है। यही वजह है कि इसकी मांग सागर के अलावा रायसेन, दमोह, कटनी, जबलपुर, विदिशा और मैहर तक बनी हुई है। अब इसकी मांग उत्तर प्रदेश तक भी पहुंच रही है।
किसान राहुल पटेल बताते हैं कि उनके आजा-पराजा के समय से गांव में इस बैंगन की खेती होती आ रही है। पहले गांव में 500 एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में इसकी खेती होती थी, लेकिन अब किसान दूसरी सब्जियों की खेती भी करने लगे हैं। वर्तमान में करीब 100 एकड़ में इस पारंपरिक बैंगन की खेती होने की बात किसान बताते हैं।
किसान कन्हई पटेल के मुताबिक वह पिछले करीब 15 साल से इसकी खेती कर रहे हैं। उनका कहना है कि गांव में यह परंपरा कितनी पुरानी है, इसकी सटीक जानकारी किसी के पास नहीं है, लेकिन पीढ़ियों से किसान इसका बीज खुद तैयार करते आ रहे हैं।
खास बात यह है कि किसान आज भी हर साल इस देसी बैंगन का पारंपरिक बीज खुद तैयार करते हैं। हालांकि अब खेती के तौर-तरीकों में आधुनिक तकनीक भी शामिल हो गई है। किसान ड्रिप मल्चिंग पद्धति से इसकी खेती कर रहे हैं। बताया जाता है कि इस पद्धति में उत्पादन कुछ कम हो सकता है, लेकिन देसी बैंगन को बाजार में हाइब्रिड से करीब डेढ़ गुना ज्यादा कीमत मिलने के कारण किसानों को इसकी भरपाई हो जाती है। इस तरह सेमरा गोपाल मन में किसान आधुनिक तकनीक के साथ करीब एक सदी पुरानी परंपरा को भी बचाए हुए हैं। खेतों में उग रहा यह अनोखा देसी बैंगन अब गांव की सिर्फ फसल नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की एक खास कृषि पहचान बन चुका है।