ग्वालियर हाईकोर्ट (फोटो सोर्स- नवभारत) 
ग्वालियर

अनुकंपा नियुक्ति मामले पर HC का बड़ा फैसला, तकनीकी आधार पर बरी होने को ससम्मान दोषमुक्त नहीं मान सकते

Gwalior HC On Compassionate Appointment: HC ने अनुकंपा नियुक्ति के मामले में कहा कि तकनीकी आधार पर बरी हुए आरोपियों को ससम्मान बरी नहीं माना जा सकता है। नियोक्ता को नौकरी देने या ना देने का अधिकार है।

प्रीतेश जैन

Gwalior High Court Decision: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर एक अहम और स्पष्ट फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि पुलिस जैसे अनुशासित विभाग में केवल आपराधिक मामलों से बरी होना ही अनुकंपा नियुक्ति के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।

जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति गवाहों के मुकर जाने, सबूतों के अभाव या समझौते के आधार पर बरी होता है, तो उसे 'ससम्मान दोषमुक्त' नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में उसे पूर्णतः निर्दोष नहीं माना जाएगा।

केस दर्ज होने के चलते नहीं मिली अनुकंपा नियुक्ति

यह फैसला योगेश शर्मा की रिट अपील पर आया है। योगेश के पिता पुलिस विभाग में कार्यरत थे और उनकी मृत्यु के बाद उन्होंने आरक्षक पद पर अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था, लेकिन चरित्र सत्यापन के दौरान उनके खिलाफ तीन आपराधिक मामले सामने आए, जिनमें धारा 379 (चोरी) और 325 (गंभीर मारपीट) के तहत केस दर्ज थे।

तकनीकी आधार पर बरी हुए, ससम्मान नहीं

पुलिस विभाग ने 11 जुलाई 2017 को उनका आवेदन यह कहते हुए निरस्त कर दिया था कि वे केवल तकनीकी आधार पर बरी हुए हैं और पुलिस सेवा के लिए उपयुक्त नहीं हैं। इसी निर्णय को चुनौती देते हुए मामला हाईकोर्ट पहुंचा था। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि अभियोजन पक्ष पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाता या गवाह अपने बयान से मुकर जाते हैं, तो आरोपी को केवल संदेह का लाभ मिलता है, जिसे ससम्मान बरी होना नहीं माना जा सकता।

नियोक्ता को फैसले का पूरा अधिकार

हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी पद के लिए पात्रता और उपयुक्तता दो अलग-अलग मानक हैं। न्यायालय चयन प्रक्रिया की वैधता की जांच कर सकता है, लेकिन यह तय नहीं कर सकता कि कोई व्यक्ति पुलिस सेवा के लिए उपयुक्त है या नहीं—यह अधिकार विभाग का है। अदालत ने आगे कहा कि जिन अभ्यर्थियों के खिलाफ आपराधिक रिकॉर्ड रहा है, उनके बारे में नियोक्ता को यह निर्णय लेने का पूरा अधिकार है कि वे भविष्य में कितने भरोसेमंद साबित होंगे। कोर्ट ने चोरी और मारपीट जैसे अपराधों को नैतिक अधमता से जुड़े गंभीर अपराधों की श्रेणी में माना।

चंडीगढ़ को दहलाने की साजिश? ISBT के पास IED और हथियार बरामद, पुलिस ने 3 को पकड़ा

काशी पहुंचे जापान के गवर्नर कोटारो नागासाकी, बोले- ग्रीन हाइड्रोजन से नई ऊंचाई छुएंगे भारत-जापान संबंध

न पीने की पानी... न बैठने की जगह, 89% स्टेशनों का बुरा हाल; CAG रिपोर्ट ने खोली रेलवे के दावों की पोल

भ्रम न फैलाएं...राष्ट्रगान विवाद पर सतीश महाना की सफाई, अनादर के आरोपों को बताया बेबुनियाद

जिस सस्ते रॉकेट लॉन्च पर भारत को था गर्व, नई स्टडी ने खोल दी पोल? जानिए क्या है पूरा मामला