Dindori District Hospital Medical Negligence: जिला चिकित्सालय डिंडौरी में भर्ती मरीज सत्यम यादव के उपचार के दौरान सामान्य सलाइन वाटर की जगह पैक्ड पेयजल की बोतल का उपयोग किए जाने का मामला अब प्रशासनिक कार्रवाई तक पहुंच गया है।
मामले को गंभीर मानते हुए कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया ने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. मनोज कुमार पाण्डेय और सिविल सर्जन एवं अस्पताल अधीक्षक डॉ. रमेश मरावी को अलग-अलग कारण बताओ नोटिस जारी किया है। प्रारंभिक जांच में चिकित्सीय मानकों के उल्लंघन और प्रशासनिक लापरवाही सामने आने के बाद यह कार्रवाई की गई है।
कलेक्टर द्वारा कराई गई प्रारंभिक जांच में पाया गया कि मरीज के उपचार के दौरान स्थापित चिकित्सीय मानकों का पालन नहीं किया गया। साथ ही अस्पताल में आवश्यक चिकित्सा सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करने में भी गंभीर चूक हुई। जांच में यह भी सामने आया कि प्रशासनिक नियंत्रण और पर्यवेक्षण में लापरवाही के कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई, जिससे मरीज की सुरक्षा और उपचार व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इस घटना ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
नोटिस में स्पष्ट किया गया है कि सीएमएचओ के रूप में डॉ. मनोज कुमार पाण्डेय तथा सिविल सर्जन एवं अस्पताल अधीक्षक के रूप में डॉ. रमेश मरावी की जिम्मेदारी जिला अस्पताल में उपचार संबंधी मानकों का पालन सुनिश्चित कराना, आवश्यक दवाओं और चिकित्सा सामग्री की उपलब्धता बनाए रखना, संसाधनों का प्रभावी प्रबंधन करना तथा चिकित्सकीय और नर्सिंग स्टाफ के कार्यों की निगरानी करना है। प्रथम दृष्टया इन दायित्वों के निर्वहन में गंभीर शिथिलता पाई गई है, जिसके चलते यह घटना सामने आई।
कलेक्टर ने दोनों अधिकारियों से पूछा है कि उनके विरुद्ध मध्य प्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1966 के नियम-16 के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों न की जाए। वहीं सीएमएचओ डॉ. मनोज कुमार पाण्डेय के मामले में यह भी उल्लेख किया गया है कि प्रथम दृष्टया उनका आचरण मध्यप्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के नियम-3 का उल्लंघन प्रतीत होता है।
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प्रशासन ने दोनों अधिकारियों को 3 अगस्त 2026 तक अपना लिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। नोटिस में स्पष्ट किया गया है कि यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया, तो उपलब्ध तथ्यों के आधार पर नियमानुसार एकपक्षीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। इस मामले ने सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा व्यवस्थाओं, निगरानी प्रणाली और जवाबदेही को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है।
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