Narottam Mishra Role In BJP Madhya Pradesh: डॉ. नरोत्तम मिश्रा मध्य प्रदेश की राजनीति में एक ऐसा नाम हैं, जिनकी अहमियत को सत्ता में रहते हुए भी और सत्ता से बाहर होने के बाद भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 2023 के विधानसभा चुनाव में दतिया से उनकी हार और हालिया 2026 के उपचुनावों में टिकट कटने के घटनाक्रम ने इस बहस को फिर से तेज कर दिया है कि "नरोत्तम मिश्रा बीजेपी के लिए जरूरी हैं या महज एक सियासी मजबूरी?"
नवभारत के स्टेट हेड सुधीर दंडोतिया ने नरोत्तम मिश्रा के कोर कमेटी में नहीं बुलाये जाने पर इसे बीजेपी की लीडर शिप के सन्देश के तौर पर देखना बताया उनके मुताबिक नरोत्तम मिश्रा का अभी कॅरियर काफी लंबा है और उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता इसके कई कारण उन्होंने बताए हैं।
डॉ. नरोत्तम मिश्रा मध्य प्रदेश में बीजेपी के सबसे कद्दावर ब्राह्मण चेहरों में गिने जाते हैं। वे 6 बार विधायक रहे हैं और शिवराज सरकार में गृह, विधि, स्वास्थ्य और संसदीय कार्य जैसे सबसे भारी-भरकम मंत्रालय संभाल चुके हैं। ग्वालियर-चंबल अंचल (जहां से ज्योतिरादित्य सिंधिया और नरेंद्र सिंह तोमर जैसे दिग्गज आते हैं) में उनकी मजबूत पकड़ है। इसके अलावा, अपनी आक्रामक कार्यशैली और मुखर हिंदुत्ववादी बयानों के कारण उनकी पहचान मध्य प्रदेश के 'सुपर गृहमंत्री' के तौर पर रही है।
उन्हें बीजेपी के भीतर एक बेहतरीन रणनीतिकार माना जाता है। भले ही वे 2023 का अपना चुनाव हार गए हों, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी ने उन्हें 'न्यू जॉइनिंग टोली' (New Joining Committee) का प्रदेश अध्यक्ष बनाया। उनके इसी चुनावी मैनेजमेंट का नतीजा था कि चुनाव से ठीक पहले मध्य प्रदेश में कांग्रेस और अन्य दलों के हजारों नेता व कार्यकर्ता बीजेपी में शामिल हो गए, जिससे राज्य में कांग्रेस का मनोबल पूरी तरह टूट गया।
नरोत्तम मिश्रा की उपयोगिता सिर्फ मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के करीबी माने जाने वाले मिश्रा को पार्टी आलाकमान ने कई बार दूसरे राज्यों में भी अहम जिम्मेदारियां दी हैं। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उन्हें कानपुर क्षेत्र की जिम्मेदारी दी गई थी (जहां ब्राह्मण वोट बैंक निर्णायक है), और वहां उन्होंने बेहतरीन नतीजे दिए। इसके अलावा गुजरात और पश्चिम बंगाल चुनावों में भी संगठन ने उनके राजनीतिक कौशल और चुनाव प्रबंधन का जमकर इस्तेमाल किया है।
मध्य प्रदेश में जब भी बीजेपी सरकार पर कोई सियासी संकट आया, नरोत्तम मिश्रा 'ट्रबलशूटर' की भूमिका में नजर आए। मार्च 2020 में कमलनाथ के नेतृत्व वाली 15 महीने पुरानी कांग्रेस सरकार को गिराने और 'ऑपरेशन लोटस' को अंजाम तक पहुंचाने में उनकी भूमिका सबसे अहम थी। इसके अलावा, संसदीय कार्य मंत्री के रूप में विधानसभा के भीतर विपक्ष के हमलों को कुंद करने और कानूनी दांव-पेंच सुलझाने में वे हमेशा पार्टी के लिए संकट मोचक साबित हुए हैं।
हाल ही में दतिया उपचुनाव (2026) में उनका टिकट कटना इस बात का संकेत है कि मध्य प्रदेश बीजेपी में एक नई लॉबी हावी हो रही है, जो पुराने कद्दावर चेहरों को एक दायरे में सीमित करना चाहती है। हालांकि, राजनीति में नरोत्तम मिश्रा जैसे मास लीडर और रणनीतिकार को लंबे समय तक हाशिए पर नहीं रखा जा सकता।
वर्तमान परिदृश्य में नरोत्तम मिश्रा बीजेपी के लिए 'सियासी मजबूरी' से कहीं अधिक 'जरूरी' हैं। चुनाव हारना राजनीति का एक हिस्सा है, लेकिन उनका 'पॉलिटिकल नेटवर्क' और संकट के समय फैसले लेने की क्षमता उन्हें पार्टी के लिए अनिवार्य बनाती है। नए नेतृत्व के उभार के बीच उन्हें भले ही थोड़ा संघर्ष करना पड़े, लेकिन उनके कद और तजुर्बे को पार्टी पूरी तरह से इग्नोर करने का जोखिम नहीं उठा सकती।