Highlights :
MP के 374 नगरीय निकायों की सरकारी खरीदी जांच के दायरे में।
वर्ष 2023 से 2026 के बीच GeM पोर्टल से 1134 करोड़ रुपये की खरीदी।
विभागीय विश्लेषण में 250 करोड़ रुपये की संभावित बचत का आकलन।
CMO, स्टोर प्रभारी, इंजीनियर और सप्लायरों की भूमिका की पड़ताल संभव।
Lokayukta Investigation into MP Urban Body Purchases : एमपी के नगरीय निकायों में सरकारी खरीदी के दौरान वित्तीय अनियमितताओं का मामला सामने आने के बाद लोकायुक्त संगठन ने जांच शुरू करने का फैसला लिया है। विभागीय विशेष ऑडिट और डेटा विश्लेषण में वर्ष 2023 से 2026 के बीच जेम पोर्टल के माध्यम से हुई खरीदी में करीब 250 करोड़ रुपये की संभावित बचत का आकलन किया गया है।
अब जांच में ये पता लगाया जाएगा कि खरीदी प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन हुआ या नहीं और इसके लिए कौन जिम्मेदार है।
प्रदेश के 374 नगरीय निकायों में तीन वर्षों के दौरान करीब 1134 करोड़ रुपये की सरकारी खरीदी की गई। विभागीय ऑडिट और डेटा विश्लेषण में आकलन किया गया कि यदि सामान की खरीद औसत और उचित बाजार दरों पर होती तो लगभग 250 करोड़ रुपये बचाए जा सकते थे। अब जांच का अहम बिंदु ये होगा कि कीमतों में अंतर के पीछे सामान्य बाजार परिस्थितियां थीं या खरीद प्रक्रिया में अनियमितताएं हुईं।
मामले में लोकायुक्त संगठन के स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट के महानिदेशक योगेश देशमुख की भूमिका जांच से जुड़ी बताई गई है। संबंधित विभाग से रिपोर्ट और दस्तावेज मांगे जाने की बात भी सामने आई है। जांच के दौरान खरीद के टेंडर, दरों, भुगतान और आपूर्तिकर्ताओं से जुड़े रिकॉर्ड की पड़ताल महत्वपूर्ण होगी।
कथित अनियमितताओं की जांच में मुख्य नगरपालिका अधिकारी स्टोर प्रभारी, बिल पास करने वाले इंजीनियर और खरीद प्रक्रिया से जुड़े अन्य अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल हो सकती है। इसके साथ ही 80 से अधिक ठेकेदारों और सप्लायरों की भूमिका भी जांच के दायरे में बताए जाने की जानकारी है। यदि जांच में भ्रष्टाचार या अन्य कानूनी उल्लंघन के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं तो संबंधित लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम सहित लागू कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
इस पूरे मामले के साथ एसीएस संजय दुबे के वायरल वीडियो को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या संजय दुबे जांच में गवाह बनेंगे और क्या उनका बयान या उपलब्ध वीडियो जांच में अहम भूमिका निभाएगा?
नगरीय निकायों में हुई सरकारी खरीदी के आंकड़ों ने खर्च की पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। 250 करोड़ रुपये की राशि को फिलहाल संभावित बचत या कथित वित्तीय अनियमितता के आकलन के रूप में ही देखा जाना चाहिए। जांच में दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर ही तय होगा कि नियमों का उल्लंघन हुआ या नहीं, सरकारी खजाने को वास्तविक नुकसान पहुंचा या नहीं और किन अधिकारियों अथवा सप्लायरों की जिम्मेदारी बनती है।