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'रक्षासूत्र' बांधने और उतारने के भी हैं नियम, अवश्य जानें सनातन धर्म की वैज्ञानिक बातें

वैष्णवी वंजारी

सीमा कुमारी

नवभारत डिजिटल: सनातन धर्म में कलावा बांधने की परंपरा सदियों से चली आ रही है, जो आज भी कायम है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या मांगलिक कार्य में कलावा या मौली विशेष रूप से बांधी जाती है। कलावे के लाल या पीले रंग का भी एक विशेष महत्व होता है। यज्ञ अनुष्ठान पूजा पाठ के बाद विद्वान या पंडित लोग हाथों में कलावा बांधते हैं, जिसे रक्षा-सूत्र के नाम से भी जाना जाता है।

अयोध्या के प्रकांड विद्वान पवन दास के अनुसार, सनातन धर्म में रक्षा सूत्र को बहुत पूजनीय माना जाता है। कहते हैं कि, रक्षा-सूत्र बांधने से व्यक्ति की हर तरह से रक्षा होती है। इतना ही नहीं वैज्ञानिक दृष्टि से भी इसका अपना अलग महत्व है। कहा जाता है कि रक्षा-सूत्र बांधने से कई तरह की बीमारियां भी दूर होती हैं। आइए जानें इस बारे में-

शास्त्रों के अनुसार, रक्षा-सूत्र बंधवाते समय हाथ में एक सिक्का लेकर मुट्ठी को बंद करना चाहिए और दूसरे हाथ को सर पर रखना चाहिए। फिर, हाथ में रखा सिक्का रक्षा सूत्र बांधने वाले पुरोहित और पंडित को दक्षिणा के स्वरूप देना चाहिए। ज्योतिष-शास्त्र के मुताबिक, रक्षा-सूत्र हमेशा दाहिने हाथ में ही बांधना चाहिए।

ऐसी मान्यता है कि किसी भी पूजा के बाद कलावा बांधने से ईश्वर की पूर्ण कृपा और आशीर्वाद मिलता है। वहीं, कलावे का लाल रंग सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है। इसलिए कलावा के रूप में बांधा जाने वाला लाल धागा शरीर और मस्तिष्क के लिए हमेशा अच्छा माना जाता है।

ज्योतिष-शास्त्र की मानें, तो रक्षा-सूत्र उतारने का शुभ केवल मंगलवार और शनिवार के दिन को ही माना जाता है। साथ ही, यह भी बताया गया है कि हाथ में पुराना रक्षा-सूत्र खोलने के बाद मंदिर से दूसरा कलावा बांधना चाहिए। पुराने कलावे को पवित्र नदी या पीपल के पेड़ के नीचे रखना चाहिए। इधर-उधर फेंकने से बचना चाहिए। कहा जाता है कि, रक्षा-सूत्र बांधने से हर तरह से रक्षा होती है। शायद यही वजह है कि पूजा-पाठ में रक्षा-सूत्र का बड़ा अहम योगदान माना जाता है।

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