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'इस' एकादशी के दिन भगवान शिव माता पार्वती का गौना करा कर लाए थे, जानिए 'रंगभरी एकादशी' का मुहूर्त और इसका महत्व

नवभारत डेस्क

सीमा कुमारी

नई दिल्ली: पंचांग के अनुसार, फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को 'रंगभरी एकादशी' (Rangbhari Ekadashi) मनाई जाती है। इस साल यह एकादशी 3 मार्च, शुक्रवार को मनाई जाएगी। इसे 'आमलकी एकादशी' और 'आंवला एकादशी' के नाम से भी जाना जाता है। वैसे तो एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है, लेकिन 'रंगभरी एकादशी' का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती से है।

'रंगभरी एकादशी' (Rangbhari Ekadashi) का शिव भक्तों के लिए विशेष महत्व होता है। 'रंगभरी एकादशी' को सभी शिवभक्त बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन शिव भक्त भगवान शिव को अबीर-गुलाल से होली खेलते है। रंगभरी एकादशी पर भगवान विष्णु और आंवले के पेड़ की भी पूजा की जाती है। आइए जानें 'रंगभरी एकादशी' की तिथि, पूजा मुहूर्त और महत्व के बारे में -

तिथि

इस साल 'रंगभरी एकादशी' 3 मार्च 2023 को मनाई जाएगी। 'रंगभरी एकादशी' के दिन से ही वाराणसी में रंगों उत्सव का आरंभ होता है, जो लगातार 6 दिनों तक चलता है।  साल में आने वाली सभी एकादशियों में यह एकमात्र ऐसी एकादशी है, जिसमें विष्णु जी के अलावा शिव-पार्वती की पूजा का विधान है।

मुहूर्त  

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की रंगभरी एकादशी :

2 मार्च 2023, गुरुवार को सुबह 6 बजकर 39 मिनट पर शुरू हो रही है।

'रंगभरी एकादशी' का समापन 3 मार्च 2023, सुबह 9 बजकर 11 मिनट पर होगा.

पूजा मुहूर्त

सुबह 8:17 - सुबह 9:44 (3 मार्च 2023)

रंगभरी एकादशी व्रत पारण समय :

 सुबह 6.48 - सुबह 9.09 (4 मार्च 2023)

पूजा विधि

रंगभरी एकादशी के दिन भगवान शिव को लाल गुलाल और माता पार्वती को श्रृंगार का सामान अर्पित करना चाहिए। इसके अलावा इस दिन रात के समय जागरण करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस दिन रात के समय. भगवान विष्णु के सामने 9 बत्तियों का दिया जलाकर भगवान विष्णु के समक्ष रख दें और इस बात का ख्याल रखें की वह रातभर जलते रहना चाहिए।

महत्व

'रंगभरी एकादशी' का महत्व शिवजी और माता पार्वती के लिए विशेष होता है। 'रंगभरी एकादशी' का दिन भगवान शंकर और माता पार्वती के वैवाहिक जीवन में बड़ा महत्व रखता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव, माता गौरी का गौना कराकर उन्हें पहली बार काशी लाए थे। उनके स्वागत में रंग-गुलाल उड़ाते हुए खुशियां मनाई थी, तब ही से इस दिन भगवान भोलेनाथ गौरा और अपने गणों के संग गुलाल की होली खेलते है। 'रंगभरी एकादशी' के दिन बाबा विश्वनाथ को दूल्हे की तरह सजाया जाता है।

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