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क्या आप थकावट और झुंझलाहट महसूस करते हैं, क्या है ‘पेरेंटल बर्नआउट' और आप क्या कर सकते हैं? जानें यहां

वैष्णवी वंजारी

ब्रिस्बेन: कई माता-पिता अपने बच्चों की देखभाल में लगने वाले समय, ऊर्जा और संसाधनों के कारण स्वयं के लिए समय नहीं निकाल पाते और इसके कारण वे ‘पेरेंटल बर्नआउट' की समस्या से ग्रसित हो सकते हैं। ‘पेरेंटल बर्नआउट' शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक थकावट है जो कि बच्चों के पालन-पोषण के कारण उत्पन्न तनाव की वजह से पैदा होती है।  शोध बताते हैं कि ‘पेरेंटल बर्नआउट' की समस्या विश्व के विभिन्न समुदायों एवं संस्कृतियों में मौजूद है। यह दुनिया भर के देशों में पाई जाने वाली समस्या है तथा पोलैंड, अमेरिका एवं बेल्जियम में बड़ी संख्या में माता-पिता इससे जूझ रहे हैं। आप थोड़ा सा आराम करके और कुछ देर सोकर इस समस्या से निजात पा सकते हैं, लेकिन वास्तविकता इससे बहुत अलग हैं। 

पेरेंटल बर्नआउट के चार संकेत

इसका पहला संकेत है- शारीरिक या भावनात्मक थकान या दोनों महसूस होना। 

दूसरा संकेत है- अपने पालन-पोषण के तरीकों को लेकर शर्मिंदा होना या यह सोचना कि आप उतने अच्छे माता-पिता नहीं रहे, जितने अच्छे आप पहले थे।

तीसरा संकेत है- माता-पिता की जिम्मेदारी को लेकर ‘परेशान' हो जाना। 

चौथा संकेत है- अपने बच्चों से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए महसूस नहीं करना। 

हालांकि कई लोग ऐसे संकेत महसूस करते हैं, लेकिन हालिया शोध में पता चला है कि 60 प्रतिशत माता-पिता आराम करने और स्वयं को फिर से ऊर्जावान बनाने के लिए कुछ नहीं करते। इस शोध से पता चलता है कि पांच में से दो माता-पिता को लगता है कि थकान के कारण वे उस तरह के माता-पिता नहीं बन पाते, जैसे वे बनना चाहते हैं। लगभग आधे माता-पिता सोचते हैं कि सब कुछ करने के लिए दिन में पर्याप्त समय नहीं है और यही समस्या है कि माता-पिता के लिए स्वयं के लिए समय निकाल पाना एक चुनौती है।  लेकिन जब वे ऐसा करते हैं, तो इसका उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इससे उन्हें पालन-पोषण से जुड़ी मांगों को पूरा करने में मदद मिलती है और इससे बच्चों और परिवारों को भी लाभ होता है। चार सकारात्मक चीजें जो माता-पिता कर सकते हैं। 

1. अपने प्रति कम आलोचनात्मक होना।

2. अपनी देखभाल को महत्वपूर्ण समझना।

3. यह याद रखना कि हर रोज अपने लिए कुछ समय निकालने का बड़ा असर होता है। 

4. बर्नआउट के संकेत नजर आने पर मदद मांगना। 

यह स्वीकार करना अहम है कि आमतौर पर बच्चों की देखभाल का अधिक भार महिलाएं उठाती हैं और उनके जीवनसाथियों, नियोक्ताओं और परिवार को बर्नआउट के संकेतों पर नज़र रखनी चाहिए और उनके कहने से पहले ही मदद की पेशकश करनी चाहिए। प्रतिस्पर्धा के इस दौर में महिलाएं भी घर से बाहर निकल कर काम करती हैं। इस स्थिति में उनके लिए विभिन्न भूमिकाओं में सामंजस्य बनाए रखना बहुत मुश्किल होता है। यदि उन्हें जीवनसाथियों, नियोक्ताओं और परिवार की ओर से कुछ सहयोग मिल जाए तो बहुत बड़ी समस्या दूर की जा सकती है। (एजेंसी)

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