Digital Safety For Kids: बच्चे अब पहले से कहीं ज्यादा और आसानी से डिजिटल मीडिया की पहुंच में है। टीनएज तक पहुँचते-पहुँचते, कई बच्चे आसानी से स्वाइप, स्क्रॉल और स्ट्रीम करना सीख जाते हैं। लेकिन बच्चों को डिजिटल सिक्योरिटी के बारे में बहुत कम ज्ञात होता है। यहीं पर माता-पिता की भूमिका अहम हो जाती है।
13 साल की उम्र से पहले, बच्चों को कुछ बुनियादी डिजिटल नियम सिखाया जाना बेहद जरूरी है, जो उनकी प्राइवेसी, सेल्फ कॉन्फिडेंस, सेफ्टी और उनकी रक्षा कर सके। यहाँ डिजिटल सुरक्षा के 5 ऐसे नियमों की जानकारी दी जा रही हैं, जो हर माता-पिता को अपने बच्चों को 13 साल की उम्र से पहले सिखानी चाहिए।
बच्चों को यह समझाना बेहद जरूरी है कि हर फ्रेंडली मैसेज किसी फ्रेंडली इंसान की तरफ से ही आए, यह जरूरी नहीं है। बच्चों को यह समझना चाहिए कि ऑनलाइन अजनबी लोग भरोसा जीतने के लिए बच्चे, टीचर, गेमर या इन्फ्लुएंसर होने का नाटक कर सकते हैं।
माता-पिता को बच्चों को डराने की ज़रूरत नहीं है। उन्हें बस बच्चों को तैयार करने की जरूरत है। उन्हें सिखाएं कि वे असल जिंदगी में न जानने वाले लोगों से फ्रेंड रिक्वेस्ट, लिंक या प्राइवेट चैट एक्सेप्ट न करें। अगर कोई फ़ोटो, सीक्रेंट या निजी जानकारी मांगता है, तो यह कोई सामान्य बातचीत नहीं बल्कि खतरे का संकेत हो सकता है।
बच्चों को अक्सर यह पता नहीं होता कि एक छोटी सी जानकारी से कितनी बातें पता चल सकती हैं। पूरे नाम, स्कूल के नाम, फ़ोन नंबर, घर के पते, लोकेशन टैग या प्रोफ़ाइल फ़ोटो का इस्तेमाल करके उनकी पहचान की जा सकती है या उन्हें ट्रैक किया जा सकता है। माता-पिता को बच्चों को सिखाना चाहिए कि निजी जानकारी प्राइवेट होती है, जिसे किसी भी वेबसाइट, गेम या ऐप के साथ साझा नहीं करनी चाहिए।
अगर कोई चीज आपकी पहचान बताती है या यह दिखाती है कि आप कहाँ हैं, तो पहले किसी बड़े से पूछें। इसमें ऐसे यूज़रनेम शामिल हैं, जिनमें बच्चे का असली नाम इस्तेमाल होता है और ऐसी पोस्ट जिनमें यूनिफ़ॉर्म, लैंडमार्क या रोजमर्रा की दिनचर्या आसानी से दिख जाती है।
बच्चों को अक्सर लगता है कि मैसेज या फ़ोटो डिलीट करने से वह गायब हो जाती है। असल में, स्क्रीनशॉट, शेयर और सेव की गई कॉपी की वजह से कोई चीज हटाए जाने के बाद भी लंबे समय तक बनी रह सकती है। इसमें चुटकुले, प्राइवेट फ़ोटो, गुस्से में भेजे गए मैसेज और खराब कमेंट भी शामिल हैं।
ऐसी कोई भी चीज ऑनलाइन पोस्ट न करें, जिसे आप अपने माता-पिता, टीचर या पूरी क्लास को दिखाने में सहज महसूस न करें। इससे उन्हें जोश में आकर कुछ भी शेयर करने से पहले रुककर सोचने में मदद मिलती है। साथ ही, यह उन्हें ऐसी जगह पर जिम्मेदारी सिखाता है।
ऑनलाइन खतरे बस एक क्लिक करते ही शुरू हो जाते हैं। नकली इनाम वाले लिंक, अनयूजुअल डाउनलोड, पॉप-अप और QR कोड से स्कैम, मैलवेयर या असुरक्षित वेबसाइटों का खतरा हो सकता है। बच्चे अक्सर उत्सुक होते हैं और जल्दी क्लिक कर देते हैं, इसलिए उन्हें यह बात सिखाना बहुत जरूरी है।
माता-पिता को बच्चों को सिखाना चाहिए कि वे कोई भी अजीब चीज खोलने से पहले रुकें। अगर किसी मैसेज में फ्री गिफ्ट्स, जरूरी चेतावनी या खास इनाम का वादा किया गया हो, तो उन्हें पहले किसी बड़े से पूछना चाहिए। यही बात अनजान ऐप्स, गेम ऐड-ऑन और अजीब पेजों के जरिए लॉग इन करने की रिक्वेस्ट पर भी लागू होती है। थोड़ी सी सावधानी बड़ी परेशानी से बचा सकती है।
डिजिटल सुरक्षा लगातार बातचीत के जरिए डेवलप की जा सकती है। 13 साल से कम उम्र के बच्चों को इंटरनेट से डरने की जरूरत नहीं है। उन्हें सही सलाह, बार-बार समझाने और भरोसे की जरूरत होती है।
जब माता-पिता उन्हें अपनी पहचान सुरक्षित रखना, अजनबियों से सवाल करना, कुछ भी पोस्ट करने से पहले सोचना, क्लिक करने से पहले रुकना और समय रहते अपनी बात कहना सिखाते हैं, तो वे उन पर पाबंदी नहीं लगा रहे होते हैं, बल्कि उन्हें सही फैसला लेना सिखा रहे होते हैं।