Vineeta Soren Mount Everest: झारखंड की धरती से निकल कर आसमान की ऊंचाईयों को छूने वाली विनीता सोरेन ने अपने साहस,संघर्ष और दृढ़ संकल्प की एक अनोखी मिसाल कायम की है। सीमित संसाधनों का अभाव होते हुए भी उन्होंने अपने सपनों को नई दिशा दी है। विनीता सोरेन माउंट एवरेस्ट पर फतह हासिल करने वाली पहली आदिवासी महिला बन गयी है। जानिए उनके संघर्ष और सफलता की कहानी।
महज 25 साल की आयु में विनीता ने जिस ऊंचाई को छुआ,उसके पीछे उनकी मेहनत और अदम्य साहस की कहानी है। दुनिया के सबसे बडे़ शिखर को छूकर उन्होने साबित कर दिया, कि सपनों की ऊंचाई किसी सामाजिक सीमा में नही बांधा जा सकता है। बता दे, कि विनीता सोरेन का जन्म 21 जून 1987 को झारखंड के सेराइकेला खरसावां जिले के राजनगर ब्लॉक के केसोरसोरा गांव में एक साधारण आदिवासी परिवार में हुआ था। उन्होंने गरीबी और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने बडे़ सपने देखने का दौर जारी रखा। विनीता का जीवन आम आदिवासी लडकियों की तरह शुरू हुआ था। वे खेतों में काम करने, सीमित शिक्षा और सीमित सपनों तक ही निर्धारित थीं। लेकिन विनीता के सपने एवरेस्ट से भी ऊंचे थे।
विनीता के गांव और आसपास के इलाकों में लड़कियों के लिए टीचिंग या नर्सिंग ही करियर माने जाते थे। लेकिन उनका सपना बिल्कुल अलग था। एवरेस्ट फतह करने से पहले उन्हें सात साल की कठोर मेहनत करनी पड़ी। इस दौरान उन्होंने सीखा कि पर्वतारोहण केवल ताकत नहीं, बल्कि मेंटल स्ट्रेंथ, साहस और संकल्प की भी परीक्षा है। भीषण ठंड और बर्फबारी के बीच कई बार कठिन पल आए। कई बार ऐसा लगा कि इस सफर की मंजिल ही नहीं है, लेकिन हिम्मत, लगन और दुनिया जीत लेने के जुनून ने उनको बर्फीले पर्वत की सबसे ऊंची चोटी पर पहुंचा दिया।
साल 2004 में विनीता पहली बार बछेंद्री पाल से मिली थीं। माउंच एवरेस्ट पर चढाई करने वाली पहली महिला बछेंद्री पाल ने ही विनीता सोरेन को प्रशिक्षण दिया। किसान परिवार से होने के कारण से पर्वतारोही बनने की उनकी हिम्मत नही हो रही थी। घर से बाहर निकलना ही उनके लिए एरेस्ट चढ़ने जैसा था। लेकिन परिवार ने भरोसा किया और आगे बढने की हिम्मत दी।
रिपोर्ट के अनुसार विनीता ने इको एवरेस्ट स्प्रिंग के तहत 20 मार्च 2012 को अपने दो साथियों के साथ जमशेदपुर सा अपनी यात्रा की शुरूआत की। 26 मई 2012 को सुबह 6:50 बजे विनीता और मेघलाल महतो ने राजेंद्र सिंह के साथ माउंट एवरेस्ट पर भारतीय झंडा फहराकर इतिहास रच दिया। एवरेस्ट विजय के अलावा विनीता ने कई साहसिक अभियानों में हिस्सा लिया।
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जिसने गुजरात के भुज से पंजाब के वाघा बॉर्डर तक लगभग 2,000 किलोमीटर की यात्रा 30 दिनों में पूरी की। विनीता सोरेन की सफलता केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह देश की आदिवासी महिलाओं और युवाओं के लिए प्रेरणा का प्रतीक है। उन्होंने साबित किया कि कठिन परिस्थितियां भी मजबूत इच्छाशक्ति और मेहनत के सामने बाधा नहीं बन सकती।