RPF Pellet Gun Firing Jantar-Mantar: दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा छात्र आंदोलन अब समाप्त हो चुका है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और उनके समर्थक अब अपने घरों में लौट चुके हैं, लेकिन इस प्रदर्शन से जुड़े कुछ विवाद अभी तक खत्म नहीं हुए हैं। खासकर आंदोलन के दौरान पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई सवालों के घेरे में है। एक तरफ जहां विपक्ष पुलिस की कार्रवाई को लेकर आलोचना कर रहा है, वहीं पुलिस अदालत के सामने भी अपनी सफाई पेश करनी पड़ रही है।
छात्र आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पर दिल्ली के जंतर-मंतर और बिहार के सिवान की दो अलग-अलग तस्वीरें तेजी से वायरल हुईं। जंतर-मंतर में जहां पुलिस पर पैलेट गन के उपयोग करने के आरोप लगे, वहीं बिहार के सिवान में एक पुलिसकर्मी प्रदर्शनकारियों की तरफ AK-47 लहराता नजर आया। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पुलिस द्वारा पैलेट गन का इस्तेमाल करना गलत था? पैलेट गन क्या होता है? इसे लेकर इतना हंगामा क्यों हो रहा है? और प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा हथियारों केउपयोग करने को लेकर क्या नियम है?
जंतर-मंतर में दिल्ली पुलिस द्वारा पैलेट गन का उपयोग करने की जानकारी सामने आई थी। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इसे लेकर सरकार के खिलाफ जमकर हमला बोला और छात्रों के आपत्ति जताई है। वहीं शनिवार को बिहार के सिवान में पुलिसकर्मी द्वारा छात्रों पर AK-47 से फायरिंग करने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। दोनों ही मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाएं दायर की गई हैं, जो पुलिस विभाग के लिए मुसीबत बनती जा रही हैं।
राजेडी नेता और राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने भी सुप्रीम कोर्ट में इसे लेकर जनहित याचिका दायर की है। इसमें उन्होंने आरोप लगाया है कि सिवान में प्रदर्शन के दौरान AK-47 का प्रयोग किया गया। इसके अलावा 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर शुरू हुए प्रदर्शन के दौरान भी पुलिस द्वारा कथित अत्यधिक बल प्रयोग के मामले में FIR दर्ज करने की मांग की गई है।
सरकार दोनों ही मामलों को गंभीरता से लेती नजर आ रही है। सिवान में जिस पुलिसकर्मी ने छात्रों पर AK-47 राइफल से फायरिंग की थी उसे तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। इसके अलावा मामले की विस्तृत जांच भी कराई जाएगी और जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की विभागीय कार्रवाई की जाएगी। पुलिस मुख्यालय ने घटना को गंभीर मानते हुए पहले ही संबंधित अधिकारियों से रिपोर्ट तलब की थी।
वहीं, जंतर-मंतर पर छात्रों पर रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) द्वारा पैलेट गन चलाए जाने का मामला भी अब तूल पकड़ चुका है। जानकारी के मुताबिक इस पूरे मामले की जांच सीआरपीएफ (CRPF) कर रही है। हालांकि सीआरपीएफ ने इसे लेकर अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। सूत्रों के मुताबिक सरकार इस मामले को लेकर कोई भी लापरवाही नहीं चाहती है।
पैलेट गन एक प्रकार की शॉटगन है, जिससे एक कारतूस के साथ सैकड़ों छोटे धातु के छर्रे निकलते हैं। इसे भीड़ नियंत्रण के लिए कम-घातक (less-lethal) हथियार माना जाता है, लेकिन यह पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। इसके छर्रे आंखों, चेहरे और शरीर के अन्य हिस्सों में गंभीर चोट पहुंचा सकते हैं। कई मामलों में स्थायी दृष्टिहानि, अंधापन और गहरी चोटें भी हुई हैं। क्योंकि छर्रे फैलकर निकलते हैं, इसलिए आसपास के लोग भी घायल हो सकते हैं। इसी कारण इसके उपयोग को लेकर विवाद रहा है और इसका प्रयोग केवल आवश्यक परिस्थितियों में, निर्धारित नियमों और सावधानियों के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
पैलेट गन का इस्तेमाल पुलिस अक्सर भीड़ को नियंत्रित करने के लिए करती है। हालांकि इसके उपयोग को लेकर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। कुछ लोग इसके इस्तेमाल को पूरी तरह से गलत मानते हैं, क्योंकि इसका उपयोग कई गंभीर परिणामों के कारण बनते हैं। इससे गंभीर चोटें हो सकती हैं, खासकर आंखों, चेहरे और ऊपरी शरीर पर। कई मामलों में स्थायी दृष्टिहानि जैसी गंभीर चोटें भी दर्ज की गई हैं। दिल्ली के छात्र प्रदर्शन के दौरान भी एक छात्र के पैलेट गन से गंभीर रूप से घायल होने की जानकारी सामने आई थी। राहुल गांधी ने खुद उस छात्र के साथ प्रेस कांफ्रेंस करते हुए दावा किया था कि उसे एक आंख से दिखाई देना बंद हो गया है।
हालांकि, कुछ विशेषज्ञ पैलेट गन के इस्तेमाल को गलत नहीं मानते हैं। भारत में पहली बार पैलेट गन का उपयोग साल 2010 में जम्मू-कश्मीर में किया गया था। वहां हिंसक प्रदर्शनकारियों और पत्थरबाजों के खिलाफ किया गया था। इसके अलावा भी कई मौकों पर प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस पैलेट गन का उपयोग करती रही है। जैसे 2023 में मणिपुर हिंसा के दौरान भी सशस्त्र बलों में हिंसक प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए पैलेट गन का इस्तेमाल किया था।
दिल्ली में RPF द्वारा छात्रों पर पैलेट गन इस्तेमाल किए जाने को लेकर हंगामा हो रहा है। लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या RPF द्वारा यह जानते हुए भी कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे अधिकतर प्रदर्शनकारी कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र और सरकारी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी हैं। उन पर पैलेट गन का उपयोग करना कितना सही था?
क्योंकि न ही ये छात्र कश्मीर में पत्थरबाजी करने वाले वो कट्टरपंथी हैं जो कुछ पैसों के लिए सेना और पुलिस पर जानलेवा हमला करने से भी पीछे नहीं हटती और न ही ये मणिपुर में जातीय हिंसा करने वाले लोग थे। पुलिस की कार्रवाई इसलिए भी सवालों के घेरे में है क्योंकि छात्रों का प्रदर्शन अधिकतर समय शांतिपूर्ण था। ऐसे में सवाल उठना तो बनता है कि क्या पुलिस को छात्रों पर पैलेट गन या AK-47 का उपयोग करना चाहिए था।
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भारत में विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा हथियारों का प्रयोग अंतिम विकल्प माना जाता है। पहले समझाने, चेतावनी देने और गैर-घातक उपायों (लाठीचार्ज, आंसू गैस, पानी की बौछार आदि) का उपयोग किया जाता है। गोली केवल तभी चलाई जानी चाहिए जब अन्य उपाय विफल हों और लोगों या पुलिसकर्मियों के जीवन पर गंभीर एवं आसन्न खतरा हो। इसका उद्देश्य खतरे को रोकना होता है, दंड देना नहीं। हर फायरिंग का रिकॉर्ड रखा जाता है और आवश्यकता पड़ने पर उसकी जांच कर जवाबदेही तय की जाती है।