Fast Track Trial For Politicians In India: भारतीय राजनीति में अपराधीकरण एक ऐसा शब्द है जिस पर दशकों से बहस होती आई है, लेकिन अब इस पर लगाम कसने के लिए एक ठोस रणनीति तैयार की गई है। सुप्रीम कोर्ट में सांसदों और विधायकों (MPs-MLAs) के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को जल्द निपटाने के लिए एक मास्टर प्लान पेश किया गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता और एमिकस क्यूरी विजय हंसारिया ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि नेताओं के मुकदमों का फैसला अब सालों तक नहीं लटकेगा, बल्कि इसके लिए एक साल की समय-सीमा तय की जा सकती है।
राजनीति में रसूख का असर अदालती कार्यवाही पर न पड़े, इसके लिए एमिकस क्यूरी ने जो आंकड़े पेश किए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्तमान और पूर्व सांसदों-विधायकों के खिलाफ कुल 4,192 आपराधिक मामले विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। इनमें से 519 मामले तो ऐसे हैं जो 10 साल से ज्यादा पुराने हैं। हैरानी की बात यह है कि साल 2025 में जहां 1,243 पुराने मामलों का निपटारा हुआ, वहीं 1,050 नए मामले दर्ज भी हो गए, जिससे पेंडेंसी कम करना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए रिपोर्ट में 'टाइम-बाउंड' ट्रायल का सुझाव दिया गया है। इस नए फॉर्मूले के तहत प्रमुख बातें इस प्रकार हैं:
प्रायोरिटी ट्रायल: सांसदों और विधायकों के लिए बनी विशेष अदालतें इन मामलों को प्राथमिकता के आधार पर सुनें और उन पर सामान्य मुकदमों का अतिरिक्त बोझ न डाला जाए।
डेडलाइन: चार्ज फ्रेम होने के बाद मुकदमे को सामान्य तौर पर 1 साल के भीतर पूरा किया जाना चाहिए।
डे-टु-डे सुनवाई: जो मामले 3 साल से ज्यादा पुराने हैं, उनकी सुनवाई हर दिन के आधार पर करने की सिफारिश की गई है।
अक्सर देखा जाता है कि रसूखदार नेता तारीखों पर पेश नहीं होते, जिससे मामले खिंचते चले जाते हैं। इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि यदि कोई आरोपी नेता लगातार दो सुनवाइयों में बिना ठोस कारण के अनुपस्थित रहता है, तो अदालत को उसके खिलाफ तुरंत गैर-जमानती वारंट जारी कर देना चाहिए। इसके अलावा, गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी विशेष अभियोजन अधिकारियों को सौंपने की बात कही गई है।
सिस्टम को पारदर्शी बनाने के लिए हाईकोर्ट्स को भी अहम निर्देश देने का सुझाव है। इसके तहत:
1. हाईकोर्ट की वेबसाइट पर इन मामलों की जानकारी रियल टाइम में उपलब्ध हो।
2. अदालती आदेश जारी होने के एक सप्ताह के भीतर उसकी 'ऑर्डर शीट' ऑनलाइन अपलोड की जाए।
3. एक ऐसा मॉडल पोर्टल बनाया जाए जहां जिलेवार और उम्र के हिसाब से मामलों की स्थिति देखी जा सके।
सिर्फ सजा दिलाना ही एकमात्र मकसद नहीं है, बल्कि राजनीति में जवाबदेही तय करना भी है। लंबित मामले होने से जनता को लंबे समय तक यह पता नहीं चलता कि उनके प्रतिनिधि पर लगे आरोप सच हैं या नहीं। साथ ही, तेज ट्रायल से उन नेताओं को भी राहत मिलेगी जिन्हें बेमतलब के आरोपों में फंसाया गया है। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी चेताया गया है कि सिर्फ समय-सीमा तय करने से काम नहीं चलेगा; जब तक अदालतों को पर्याप्त संसाधन, समय पर फॉरेंसिक रिपोर्ट और गवाहों की सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक लक्ष्य हासिल करना कठिन होगा।
यदि सुप्रीम कोर्ट इन सुझावों को अमलीजामा पहनाता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा। इससे न केवल राजनीति में अपराधियों की एंट्री पर लगाम लगेगी, बल्कि न्याय व्यवस्था में आम आदमी का भरोसा भी बढ़ेगा।