EC Objections Sukhbir Sandhu Vivek Joshi: भारतीय चुनाव आयोग (ECI) की आंतरिक कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के अकेले फैसले लेने के तरीके को लेकर एक नई कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को चुनाव आयोग में सामूहिक निर्णय व्यवस्था लागू करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमति दे दी है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने यह मामला रखा, जिसके बाद अदालत ने इस पर अगले हफ्ते सुनवाई तय की है।
याचिका में दलील दी गई है कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों का संचालन और नियंत्रण पूरे 'आयोग' में निहित है, न कि केवल मुख्य चुनाव आयुक्त में। याचिका में अन्य चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की लिखित आपत्तियों का हवाला दिया गया है, जिन्होंने आरोप लगाया है कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कई बड़े फैसले उनकी मंजूरी के बिना लिए गए। हालांकि, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि बहुसदस्यीय संस्था में आंतरिक मतभेद सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं और इसे संस्थागत टूट नहीं माना जा सकता।
याचिका में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की लिखित टिप्पणियों और फाइल नोटिंग का भी जिक्र है। आरोप है कि इन दोनों आयुक्तों ने अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 आपत्तियां दर्ज कराई हैं। उनका कहना है कि चुनाव आयोग के नाम पर कई फैसले उनकी मंजूरी के बिना लिए गए।
आपत्तियां कई मुद्दों से जुड़ी हैं, जैसे बिना आयोग की मंजूरी के आदेश जारी करना, बैठकों से पहले एजेंडा और बाद में कार्यवाही का ब्योरा न देना, बिना मंजूरी के विदेश यात्रा करना, फॉर्म 6 में बदलाव, वोटर लिस्ट के डेटाबेस तक पहुंच और पश्चिम बंगाल में ट्रिब्यूनल के सामने अपील दायर करना।
याचिका में यह भी कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने वोटर लिस्ट के डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकरण और चुनाव आयोग के आईटी विभाग के काम के बंटवारे में बदलाव पर भी चिंता जताई थी।
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि यह घोषित किया जाए कि अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को दी गई शक्तियों का इस्तेमाल आयोग के संवैधानिक और कानूनी ढांचे के अनुसार ही हो। इसके साथ ही सामूहिक निर्णय व्यवस्था का पालन सुनिश्चित करने और विवादित फैसलों से जुड़े रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने की भी मांग की गई है।
वहीं, चुनाव आयोग का कहना है कि आयुक्तों के बीच मतभेद को संस्थागत 'टूट' नहीं कहा जा सकता और एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में आंतरिक आपत्तियां और लिखित नोट सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग ने यह भी कहा है कि एसआईआर से जुड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।