21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में हुयी थी जनसंघ की स्थापना
1952 से 1971 तक लोकसभा चुनावों में बेहतर हो रहा था जनसंघ का सफर
1977 आपातकाल के बाद जनता पार्टी में जनसंघ का कर दिया गया विलय
RSS की दोहरी सदस्यता पर जनता पार्टी में पड़ी दरार
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 1980 में BJP का हुआ गठन
Jan Sangh Foundation Day: अगर अपने देश की राजनीति व राजनीतिक दलों के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि भारत की राजनीति में आजादी के तुरंत बाद कई सियासी दलों का उदय हुआ। इन्हीं में से एक प्रमुख दल था अखिल भारतीय जनसंघ। जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में की गई थी। इसके संस्थापक सदस्यों में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, प्रोफेसर बलराज मधोक और पंडित दीनदयाल उपाध्याय शामिल थे। इस पार्टी का चुनाव चिह्न 'दीपक' था। 1952 में देश के पहले संसदीय चुनाव में जनसंघ ने कुल 3 सीटें हासिल की थीं, जिनमें से एक सीट पर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी खुद चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे।
आजादी के बाद के दो दशकों में जनसंघ ने भारतीय राजनीति में अपनी स्थिति लगातार मजबूत की। 1952 के पहले चुनाव में पार्टी को 3.1 प्रतिशत वोट और 3 सीटें मिली थीं। इसके बाद 1957 के चुनाव में 5.9 प्रतिशत वोट के साथ 4 सीटें, 1962 में 6.4 प्रतिशत वोट के साथ 14 सीटें और 1967 के चुनाव में 9.4 प्रतिशत वोट हासिल कर 35 सीटों पर बड़ी सफलता पाई। हालांकि 1971 के आम चुनाव में वोट शेयर थोड़ा घटकर 7.37 प्रतिशत रहा और पार्टी को 22 सीटें मिलीं।
1975 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू किया, तो इसके विरोध में पूरा विपक्ष एक मंच पर आ गया। बिहार में जनसंघ के विधायक दल के नेता लालमुनि चौबे ने जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के समर्थन में अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया। आपातकाल खत्म होने के बाद 1977 के चुनावों से पहले कांग्रेस के खिलाफ जनसंघ, कांग्रेस (O), भारतीय लोकदल और सोशलिस्ट पार्टी ने मिलकर एक नया दल 'जनता पार्टी' बनाया। इस चुनाव में जनता पार्टी को भारी जीत मिली और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने।
सत्ता में आने के कुछ ही समय बाद जनता पार्टी में अंदरूनी खींचतान शुरू हो गई। इस कलह की मुख्य वजह बनी 'दोहरी सदस्यता' का मुद्दा। जनता पार्टी में शामिल समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारधारा के नेताओं को इस बात पर कड़ी आपत्ति थी कि जनसंघ पृष्ठभूमि के नेता जनता पार्टी में रहने के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के लिए भी काम करते हैं। विरोधी गुटों ने शर्त रखी कि जनसंघ के नेताओं को या तो आरएसएस छोड़ना होगा या फिर जनता पार्टी से अलग होना पड़ेगा।
उस समय अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने अन्य नेताओं को समझाने की बहुत कोशिश की कि आरएसएस कोई राजनीतिक दल नहीं बल्कि एक सामाजिक संगठन है, इसलिए इससे जुड़े रहने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन विरोधी गुट अपनी मांग पर अड़े रहे। इस वैचारिक मतभेद और खींचतान के कारण 1979 में मोरारजी देसाई की सरकार गिर गई। इसके बाद 1980 के चुनाव में हार के बाद जनता पार्टी ने आरएसएस पृष्ठभूमि वाले नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया। तब नए राजनीतिक दल की चर्चा शुरू हो गयी थी।
जनता पार्टी से बेदखल होने के बाद जनसंघ के पुराने नेताओं ने एक नई राजनीतिक राह चुनने का फैसला किया। 6 अप्रैल 1980 को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और मदनलाल खुराना जैसे वरिष्ठ नेताओं ने मिलकर 'भारतीय जनता पार्टी' की स्थापना की।
अटल बिहारी वाजपेयी को भारतीय जनता पार्टी का पहला राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। स्थापना दिवस के इस कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं और कवियों को लाने में डॉ. वेदव्यास महाजन की अहम भूमिका रही।
शुरुआत में भाजपा ने जनसंघ की हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा के साथ-साथ 'गांधीवादी समाजवाद' और जनता पार्टी की लोकतांत्रिक विरासत को साथ लेकर चलने का संकल्प लिया, ताकि पार्टी का जनाधार व्यापक हो सके।
दूसरी तरफ, जनसंघ के संस्थापक सदस्य प्रोफेसर बलराज मधोक ने चुनाव आयोग में पंजीकृत कराकर 'अखिल भारतीय जनसंघ' को अलग से बनाए रखा, जो 2016 में उनके निधन तक इसके अध्यक्ष रहे। हालांकि, 1980 में जन्मी भाजपा आज केंद्र और देश के कई राज्यों की सत्ता पर आसीन होकर भारत की सबसे बड़ी और ताकतवर राजनीतिक पार्टी बन चुकी है।