अखिल भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, बलराज मधोक और पंडित दीनदयाल उपाध्याय डिजाइन फोटो
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ये हैं जनसंघ के खत्म होने के 3 असली कारण, आपातकाल में लिखी गयी थी पटकथा, फिर हुआ सबसे ताकतवर पार्टी का जन्म

Jan Sangh vs BJP:भारतीय जनसंघ कैसे बना और क्यों हुआ इसका अंत? जानिए आपातकाल, दोहरी सदस्यता के विवाद और फिरोजशाह कोटला मैदान में अटल-आडवाणी द्वारा BJP की स्थापना की पूरी कहानी।

विजय कुमार तिवारी, आकाश मसने

Highlights

  • 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में हुयी थी जनसंघ की स्थापना

  • 1952 से 1971 तक लोकसभा चुनावों में बेहतर हो रहा था जनसंघ का सफर

  • 1977 आपातकाल के बाद जनता पार्टी में जनसंघ का कर दिया गया विलय

  • RSS की दोहरी सदस्यता पर जनता पार्टी में पड़ी दरार

  • अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 1980 में BJP का हुआ गठन

Jan Sangh Foundation Day: अगर अपने देश की राजनीति व राजनीतिक दलों के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि भारत की राजनीति में आजादी के तुरंत बाद कई सियासी दलों का उदय हुआ। इन्हीं में से एक प्रमुख दल था अखिल भारतीय जनसंघ। जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में की गई थी। इसके संस्थापक सदस्यों में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, प्रोफेसर बलराज मधोक और पंडित दीनदयाल उपाध्याय शामिल थे। इस पार्टी का चुनाव चिह्न 'दीपक' था। 1952 में देश के पहले संसदीय चुनाव में जनसंघ ने कुल 3 सीटें हासिल की थीं, जिनमें से एक सीट पर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी खुद चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे।

1952 से 1971 तक: लोकसभा चुनावों में बढ़ता रहा पार्टी का ग्राफ

आजादी के बाद के दो दशकों में जनसंघ ने भारतीय राजनीति में अपनी स्थिति लगातार मजबूत की। 1952 के पहले चुनाव में पार्टी को 3.1 प्रतिशत वोट और 3 सीटें मिली थीं। इसके बाद 1957 के चुनाव में 5.9 प्रतिशत वोट के साथ 4 सीटें, 1962 में 6.4 प्रतिशत वोट के साथ 14 सीटें और 1967 के चुनाव में 9.4 प्रतिशत वोट हासिल कर 35 सीटों पर बड़ी सफलता पाई। हालांकि 1971 के आम चुनाव में वोट शेयर थोड़ा घटकर 7.37 प्रतिशत रहा और पार्टी को 22 सीटें मिलीं।

जनसंघ का चुनाव चिन्ह दीपक

आपातकाल के दौरान जनता पार्टी में जनसंघ का ऐतिहासिक विलय

1975 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू किया, तो इसके विरोध में पूरा विपक्ष एक मंच पर आ गया। बिहार में जनसंघ के विधायक दल के नेता लालमुनि चौबे ने जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के समर्थन में अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया। आपातकाल खत्म होने के बाद 1977 के चुनावों से पहले कांग्रेस के खिलाफ जनसंघ, कांग्रेस (O), भारतीय लोकदल और सोशलिस्ट पार्टी ने मिलकर एक नया दल 'जनता पार्टी' बनाया। इस चुनाव में जनता पार्टी को भारी जीत मिली और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने।

'दोहरी सदस्यता' का विवाद भी था प्रमुख कारण

सत्ता में आने के कुछ ही समय बाद जनता पार्टी में अंदरूनी खींचतान शुरू हो गई। इस कलह की मुख्य वजह बनी 'दोहरी सदस्यता' का मुद्दा। जनता पार्टी में शामिल समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारधारा के नेताओं को इस बात पर कड़ी आपत्ति थी कि जनसंघ पृष्ठभूमि के नेता जनता पार्टी में रहने के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के लिए भी काम करते हैं। विरोधी गुटों ने शर्त रखी कि जनसंघ के नेताओं को या तो आरएसएस छोड़ना होगा या फिर जनता पार्टी से अलग होना पड़ेगा।

अटल-आडवाणी की बात न मानने से गिर गयी सरकार

उस समय अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने अन्य नेताओं को समझाने की बहुत कोशिश की कि आरएसएस कोई राजनीतिक दल नहीं बल्कि एक सामाजिक संगठन है, इसलिए इससे जुड़े रहने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन विरोधी गुट अपनी मांग पर अड़े रहे। इस वैचारिक मतभेद और खींचतान के कारण 1979 में मोरारजी देसाई की सरकार गिर गई। इसके बाद 1980 के चुनाव में हार के बाद जनता पार्टी ने आरएसएस पृष्ठभूमि वाले नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया। तब नए राजनीतिक दल की चर्चा शुरू हो गयी थी।

भाजपा नेता विजया राजे सिंधिया, अटल बिहारी वाजपेई और लाल कृष्ण आडवानी

6 अप्रैल 1980 को फिरोजशाह कोटला मैदान में भाजपा का जन्म

जनता पार्टी से बेदखल होने के बाद जनसंघ के पुराने नेताओं ने एक नई राजनीतिक राह चुनने का फैसला किया। 6 अप्रैल 1980 को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और मदनलाल खुराना जैसे वरिष्ठ नेताओं ने मिलकर 'भारतीय जनता पार्टी' की स्थापना की।

अटल बिहारी वाजपेयी को भारतीय जनता पार्टी का पहला राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। स्थापना दिवस के इस कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं और कवियों को लाने में डॉ. वेदव्यास महाजन की अहम भूमिका रही।

गांधीवादी समाजवाद का नारा लेकर चली भाजपा बनी दुनिया की सबसे ताकतवर पार्टी

शुरुआत में भाजपा ने जनसंघ की हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा के साथ-साथ 'गांधीवादी समाजवाद' और जनता पार्टी की लोकतांत्रिक विरासत को साथ लेकर चलने का संकल्प लिया, ताकि पार्टी का जनाधार व्यापक हो सके।

दूसरी तरफ, जनसंघ के संस्थापक सदस्य प्रोफेसर बलराज मधोक ने चुनाव आयोग में पंजीकृत कराकर 'अखिल भारतीय जनसंघ' को अलग से बनाए रखा, जो 2016 में उनके निधन तक इसके अध्यक्ष रहे। हालांकि, 1980 में जन्मी भाजपा आज केंद्र और देश के कई राज्यों की सत्ता पर आसीन होकर भारत की सबसे बड़ी और ताकतवर राजनीतिक पार्टी बन चुकी है।

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