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श्री राम जन्मभूमि आंदोलन: सदियों की लड़ाई, लाखों का बलिदान; जानें 495 साल के वनवास की पूरी कहानी

मृणाल पाठक

जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती॥

रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता॥

अर्थात: जिनके विरह में आप दिन-रात सोच करते (घुलते) रहते हैं और जिनके गुणसमूहों की पंक्तियों को आप निरंतर रटते रहते हैं, वे ही रघुकुल के तिलक, सज्जनों को सुख देने वाले और देवताओं तथा मुनियों के रक्षक राम सकुशल आ गए। 14 साल का वनवास समाप्त कर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम वापस अयोध्या लौटे तब भरत ने राज्यवासियों को जानकारी देते हुए यह बात कही थी। 

त्रेतायुग का वनवास केवल 14 साल का था, लेकिन कलयुग का वनवास 495 साल से ज्यादा रहा। जिसके बाद अब 22 जनवरी 2024 को राघव अपने घर लौटने वाले हैं। त्रेतायुग में जहां श्री राम ने रावण को हराया था। वहीं कलयुग में मनुष्य रूपी रावण को हराया। सीतापति का आगमन जितना सुखदाई और भक्ति से भरा हुआ है, लेकिन इसका रास्ता सतयुग से भी कठिन था। राम भक्तों को अपने भगवान के लिए सदियों तक लड़ाई लड़नी पड़ी। जहां हजारों की संख्या में राम भक्तों ने अपनी जान गंवाई, वहीं लाखों ने अपना जीवन खपा दिया। आज की इस स्टोरी में जानेंगे भगवान राम का कलयुगी वनवास कैसे समाप्त हुआ… 

साल 1528: 

1528 ये वो साल था, जब मुगल बादशाह बाबर के सिपहसालार मीर बाकी ने (विवादित जगह पर) एक मस्जिद का निर्माण किया था। जिसे लेकर हिंदू समुदाय ने दावा किया कि यह जगह भगवान राम की जन्मभूमि है। साथ ही इस जगह पर एक प्राचीन मंदिर हुआ करता था। हिंदू पक्ष की मानें तो मुख्य गुंबद के नीचे ही भगवान राम का जन्मस्थान था। बता दें कि बाबरी मस्जिद में तीन गुंबदें थीं।

साल 1853:

1853 में पहली बार हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच इस जमीन को लेकर विवाद हुआ। जहां बाबरी मस्जिद बनाई गई थी। हिन्दुओं ने इस जगह को रामलला का जन्मस्थल कहा था। 

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साल 1859:

1859 में अंग्रेजों ने इस विवाद में हस्तक्षेप किया था। अंगेजों ने विवाद को ध्यान में रखते हुए नमाज के लिए मुसलमानों को अंदर का हिस्सा और पूजा के लिए हिन्दुओं को बाहर का हिस्सा उपयोग में लाने को कहा था।

साल 1949: 

1949 में दोनों समुदाय के बीच असली विवाद शुरू हुआ। 23 दिसंबर 1949 को, जब भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गई, तब हिन्दुओं का कहना था कि भगवान राम प्रकट हुए हैं, जबकि मुसलमानों ने आरोप लगाया कि किसी ने रात में चुपचाप मूर्तियां वहां रख दीं। 

यूपी सरकार ने मूर्तियां हटाने का आदेश दिया, लेकिन जिला मैजिस्ट्रेट (डीएम) केके नायर ने दंगों और हिन्दुओं की भावनाओं के भड़कने के डर से इस आदेश को पूरा करने में असमर्थता जताई। सरकार ने इसे विवादित ढांचा मानकर ताला लगवा दिया। 

साल 1950: 

1950 में फैजाबाद सिविल कोर्ट में दो अर्जी दाखिल की गई। इसमें एक में रामलला की पूजा की इजाजत और दूसरे में विवादित ढांचे में भगवान राम की मूर्ति रखे रहने की इजाजत मांगी गई थी। 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने तीसरी अर्जी दाखिल की थी।

साल 1961: 

1961 में उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अर्जी दाखिल कर विवादित जगह के पजेशन और मूर्तियां हटाने की मांग की थी।

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साल 1984: 

1984 में विवादित ढांचे की जगह मंदिर बनाने के लिए विश्व हिंदू परिषद ने एक कमिटी गठित की थी।

साल 1986: 

1986 में जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल को हिंदुओं की पूजा के लिए खोलने का आदेश दिया। मुस्लिम समुदाय ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी गठित की। 

साल 1989:

1989 में विश्व हिन्दू परिषद ने विवादित स्थल से सटी जमीन पर राम मंदिर की मुहिम शुरू की।

साल 1992:

6 दिसंबर 1992 को वीएचपी और शिवसेना समेत दूसरे हिंदू संगठनों के लाखों कार्यकर्ताओं ने विवादित ढांचे (बाबरी मस्जिद) को गिरा दिया। जिसके बाद देशभर में सांप्रदायिक दंगे भड़के, जिनमें 2 हजार से ज्यादा लोग मारे गए।

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उसके दस दिन बाद 16 दिसंबर 1992 को लिब्रहान आयोग गठित किया गया। आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के सेवानिवृत मुख्य न्यायाधीश एम.एस. लिब्रहान को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया।

साल 1993:

लिब्रहान आयोग को 16 मार्च 1993 को यानी तीन महीने में रिपोर्ट देने को कहा गया था, लेकिन आयोग ने रिपोर्ट देने में 17 साल लगा दिए।

इसी साल केंद्र के इस अधिग्रहण को सुप्रीम कोर्ट में मोहम्मद इस्माइल फारुकी ने चुनौती दी थी। हालांकि कोर्ट ने इस चुनौती को ख़ारिज कर दिया था। 

साल 2002: 

हिंदू कार्यकर्ताओं को लेकर जा रही ट्रेन में गोधरा में आग लगा दी गई, जिसमें 58 लोगों की मौत हो गई। इसकी वजह से गुजरात में हुए दंगे में 2 हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे।

साल 2009: 

30 जून 2009 को लिब्रहान आयोग ने चार भागों में 700 पन्नों की रिपोर्ट प्रधानमंत्री डॉ॰ मनमोहन सिंह और गृह मंत्री पी। चिदम्बरम को सौंपा।

साल 2010:

2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने निर्णय सुनाया जिसमें विवादित भूमि को रामजन्मभूमि घोषित किया गया। न्यायालय ने बहुमत से निर्णय दिया कि विवादित भूमि जिसे रामजन्मभूमि माना जाता रहा है, उसे हिंदू गुटों को दे दिया जाए। न्यायालय ने यह भी कहा कि वहाँ से रामलला की प्रतिमा को नहीं हटाया जाएगा। 

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न्यायालय ने यह भी पाया कि चूंकि सीता रसोई और राम चबूतरा आदि कुछ भागों पर निर्मोही अखाड़े का भी कब्ज़ा रहा है इसलिए यह हिस्सा निर्माही अखाड़े के पास ही रहेगा। दो न्यायधीधों ने यह निर्णय भी दिया कि इस भूमि के कुछ भागों पर मुसलमान प्रार्थना करते रहे हैं इसलिए विवादित भूमि का एक तिहाई हिस्सा मुसलमान गुटों दे दिया जाए। लेकिन हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों ने इस निर्णय को मानने से अस्वीकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

साल 2011: 

2011 में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाई।

साल 2017:

उच्चतम न्यायालय ने 7 साल बाद फैसला लिया कि 11 अगस्त 2017 से तीन न्यायधीशों की पीठ इस विवाद की सुनवाई प्रतिदिन करेगी। सुनवाई से ठीक पहले शिया वक्फ बोर्ड ने न्यायालय में याचिका लगाकर विवाद में पक्षकार होने का दावा किया।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि 5 दिसंबर 2017 से इस मामले की अंतिम सुनवाई शुरू की जाएगी।

साल 2019: 

8 मार्च 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा। पैनल को 8 सप्ताह के अंदर कार्यवाही खत्म करने को कहा। जिसके बाद 1 अगस्त 2019 को मध्यस्थता पैनल ने रिपोर्ट प्रस्तुत की।

2 अगस्त 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता पैनल मामले का समाधान निकालने में विफल रहा। 6 अगस्त 2019 को सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की रोजाना सुनवाई शुरू हुई। 16 अक्टूबर 2019 को आख़िरकार अयोध्या मामले की सुनवाई पूरी हुई और सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा।

फिर 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने राम मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया। 2.77 एकड़ विवादित जमीन हिंदू पक्ष को मिली। मस्जिद के लिए अलग से 5 एकड़ जमीन मुहैया कराने का आदेश दिया गया।

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साल 2020: 

25 मार्च 2020, ये वह तारीख है जब तकरीबन 28 साल बाद रामलला टेंट से निकलर फाइबर के मंदिर में आए। जिसे देखकर हिन्दुओं के मन को शांति पहुंची।  

फिर 5 अगस्त 2020 को राम मंदिर का भूमि पूजन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसके लिए पीएम नरेंद्र मोदी, आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत, यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और साधु-संतों समेत 175 लोगों को न्योता दिया गया। इस दौरान अयोध्या पहुंचकर पीएम मोदी ने हनुमानगढ़ी में सबसे पहले दर्शन किया, फिर राम मंदिर के भूमि पूजन कार्यक्रम में शामिल हुए।

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जानकारी के लिए बता दें कि 22 जनवरी 2024 को भगवान श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा भी होगी। साथ ही प्रधानमंत्री मोदी द्वारा भव्य राम मंदिर का उद्घाटन होगा। यह देश का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन होने वाला है। जो युगों-युगों तक याद किया जाएगा। 

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