काकोरी एक्शन के नायक राजेंद्रनाथ लाहिड़ी सोर्स- IANS
देश

जरा याद करो कुर्बानी: काकोरी कांड का वो हीरो, जिसने अंग्रेजों की उड़ाई नींद, फांसी के वक्त चेहरे पर थी मुस्कान

Kakori Kand Rajendra Lahiri: काकोरी एक्शन के नायक राजेंद्रनाथ लाहिड़ी से भयभीत अंग्रेजों ने तय तारीख से 2 दिन ही पहले फांसी दी थी। जानिए इस अमर बलिदानी की पूरी गाथा।

अमन मौर्या

Freedom Fighter Rajendra Lahiri: देश की आजादी के लिए असंख्य देशभक्तों ने अपना बलिदान दिया है। हिंदुस्तान के इतिहास में ऐसे-ऐसे बलिदानी हुए हैं जिनकी गौरव गाथा सुनकर देशवासियों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। ऐसे ही एक क्रांतिकारी थे राजेंद्रनाथ लहिड़ी। देश के स्वतंत्रता संग्राम में इन्होंने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था।

अंग्रेजों द्वारा इन्हें फांसी की सजा सुनाई गई थी, लेकिन मौत की अंतिम घड़ी में भी उनके चेहरे पर मौत का खौफ नहीं दिखा। अंग्रेज अधिकारी इस कदर डरे हुए थे कि तय तारीख से दो दिन पहले ही उत्तर प्रदेश की गोंडा जेल में उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया।

काकोरी कांड की बनाई योजना

आजादी के पहले प्रसिद्ध काकोरी एक्शन में इनका नाम प्रमुखता से आता है। काकोरी एक्शन की योजना इन्होंने ही बनाई थी। यह काकोरी कांड के नाम से भी जाना जाता है। इसमें देश के लोगों की खून पसीने की कमाई को क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराया था। शाहजहांपुर से लखनऊ जा रही ट्रेन को 9 अगस्त, 1925 को काकोरी के पास क्रांतिकारियों ने लूट लिया था। ट्रेन में भारतीयों की खून-पसीने की कमाई थी।

काकोरी कांड

काकोरी कांड में अशफाक उल्ला खान, राम प्रसाद बिस्मिल, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, चंद्रशेख आजाद, मनमथ नाथ गुप्ता समेत अन्य क्रांतिकारी शामिल थे। ट्रेन लूट के दौरान मनमथ नाथ गुप्ता द्वारा अनजाने मे एक गोली चल गई थी जिससे एक यात्री की मौके पर ही मौत हो गई थी।

अंग्रेजों का समर्थन करने वाले जमीदारों को भी लूटा

दरअसल, क्रांतिकारियों को अंग्रेजों के खिलाफ मिशन के लिए धन की जरूरत थी। इसलिए पहले उन्होंने अंग्रेजों का समर्थन करने वाले भारतीय जमीदारों को भी कई बार लूटा था। इसी क्रम में अंग्रेजों का खजाना लूटने के लिए काकोरी ऐक्शन प्लान बनाया गया। काकोरी कांड के बाद कई क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने फांसी की सजा सुनाई। उनमें राजेंद्रनाथ लाहिड़ी का नाम भी शामिल था।

काकोरी कांड

फांसी वाले दिन कर रहे थे व्यायाम

क्रांतिकारी राजेंद्र लाहिड़ी मौत से बेखौफ होकर फांसी वाले दिन भी सुबह कसरत कर रहे थे। उन्हें कसरत करता देखकर जेलर भी हैरान था। पास आकर पूछने पर उन्होंने कहा कि मैं जन्म से हिंदू हूं और पूर्वजन्म में मुझे आस्था है। आगे उन्होंने कहा कि अगले जनम में स्वस्थ शरीर के साथ मैं पैदा होना चाहता हूं जिससे कि अधूरा काम पूरा करूं और मेरा देश आजाद हो जाए। लाहिड़ी के इस जवाब से अंग्रेज अधिकारी दंग रह गया।

काशी में क्रांतिकारियों के संपर्क में आए राजेंद्रनाथ

क्रांतिकारी राजेंद्रनाथ लाहिड़ी बेहद संपन्न परिवार से आते थे। उनके पिता तत्कालीन बंगाल प्रेसिडेंसी के पाबना जिले के एक गांव में जमींदार हुआ करते थे। वह स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े हुए थे और कई बार जेल जा चुके थे। पिता ने जब राजेंद्रनाथ को पढ़ने के लिए बनारस भेजा तो यहां बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में वे शचींद्रनाथ सान्याल के संपर्क में आए। उस समय वो हेल्थ यूनियन में सचिव और बंगाल साहित्य परिष्द के ऑनररी सेक्रटरी थे।

बंगाली साहित्य में राजेंद्रनाथ झुकाव होने के कारण उनको काशी से प्रकाशित होने वाली पत्रिका बंग वाणी का संपादक बनाया गया। संपादक बनने के बाद उनके क्रांतिकारी लेख छपने लगे। यहीं से वे क्रांतिकारियों के संपर्क में आए।

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