अरविंद केजरीवाल (फोटो- सोशल मीडिया) 
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लुधियाना की जीत से AAP जोश में, केजरीवाल का 100 सीटों का टारगेट

पंजाब के लुधियाना से जीत की खुशी में केजरीवाल ने नेताओं को बधाई दी और 2027 के लक्ष्य पर जोर दिया। वे बोले प्रो-इनकंबेंसी दिख रही, अगली बार 100 पार सीटें जीतनी चाहिए, लेकिन सतर्क भी रहना होगा।

सौरभ शर्मा

चंडीगढ़: पंजाब की राजनीति में आम आदमी पार्टी की लुधियाना वेस्ट सीट पर जीत ने जरूर एक नई ऊर्जा भरी है, लेकिन क्या इसी लय में 2027 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी को सफलता मिलेगी? आप नेता अरविंद केजरीवाल ने इस जीत के बाद कहा कि अगली बार पार्टी 100 से अधिक सीटें जीत सकती है। लेकिन इस दावे के साथ कई सवाल भी उठ खड़े हुए हैं क्या लुधियाना की जीत पूरे पंजाब का प्रतिनिधित्व करती है? क्या कांग्रेस और बीजेपी फिर से मजबूत होकर वापसी कर सकती हैं?

2022 में जब आम आदमी पार्टी ने बहुमत के साथ पंजाब में सरकार बनाई थी, तब कांग्रेस अंदरूनी कलह और नेतृत्व संकट से जूझ रही थी। अकाली दल और बीजेपी का गठबंधन भी बिखरा हुआ था। इस राजनीतिक खालीपन का फायदा आम आदमी पार्टी को मिला। लेकिन तीन साल सरकार चलाने के बाद अब पार्टी एंटी-इनकंबेंसी की चुनौती का सामना कर सकती है। हालांकि केजरीवाल इसे प्रो-इनकंबेंसी मानते हैं, लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट कुछ और भी कहती है।

कांग्रेस में गुटबाजी अभी भी बरकरार

लुधियाना उपचुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार भारत भूषण आशु हार गए। उन्होंने हार की जिम्मेदारी ली लेकिन साथ ही प्रदेश नेतृत्व पर सवाल भी खड़े किए। आशु का कहना है कि कांग्रेस अध्यक्ष राजा वड़िंग और विपक्ष के नेता प्रताप बाजवा ने चुनाव प्रचार से दूरी बनाए रखी, जबकि उन्हें आना चाहिए था। इस गुटबाजी से साफ है कि कांग्रेस में अब भी एकजुटता की कमी है, जिसका नुकसान पार्टी को 2027 में भी हो सकता है।

आंकड़ों पर गौर करें तो आशु को इस बार संजीव अरोड़ा से 10,637 वोटों से हार का सामना करना पड़ा, जबकि पिछली बार यह अंतर 7,512 का था। बीजेपी उम्मीदवार जीवन गुप्ता को 20,323 वोट मिले, जो आशु से महज 4 हजार कम हैं। ये संकेत हैं कि मुकाबला त्रिकोणीय बन सकता है और किसी भी दल को 100 पार करना आसान नहीं होगा।

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आसान नहीं है ‘100 पार’ का सपना

केजरीवाल के दावे में आत्मविश्वास है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि पंजाब की राजनीति बेहद जटिल है। दिल्ली में जो फॉर्मूला चलता है, वो पंजाब में नहीं चलता। यहां की जातीय और क्षेत्रीय समीकरण अलग हैं। 2027 तक कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही खुद को मजबूत स्थिति में लाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में किसी भी दल के लिए '100 पार' का दावा अभी जल्दबाजी होगा।

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