नरेन्द्र मोदी व लालकृष्ण आडवाणी (डिजाइन फोटो) 
देश

PM Modi @75: कैसे हुआ 'मोदी का उदय' और अस्त हो गया आडवाणी का सियासी सूर्य, नाराजगी के बीच बने PM फेस

PM Narendra Modi Birthday Special: लालकृष्ण आडवाणी और कई दिग्गज बीजेपी नेताओं की नाराजगी के बावजूद 13 सितंबर 2013 को नरेन्द्र मोदी PM फेस घोषित कर दिए गए। यहीं से 'मोदी का उदय' हो गया।

अभिषेक सिंह

PM Narendra Modi Birthday: इस महीने यानी सितंबर की 17 तारीख को देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 75 साल के होने जा रहे हैं। अब से ठीक 12 साल पहले 13 सितंबर को उन्हें साल 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए पीएम पद का उम्मीदवार घोषित किया गया था। यह घोषणा भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने नई दिल्ली में पार्टी संसदीय दल की बैठक के बाद की।

इस बैठक में तमाम कोशिशों के बावजूद आडवाणी बैठक में शामिल नहीं हुए। सुषमा स्वराज और मुरली मनोहर जोशी भी प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी की उम्मीदवारी का विरोध कर रहे थे, लेकिन अंततः वे पार्टी के बहुमत के आगे झुक गए। अब सवाल यह है कि मोदी की उम्मीदवारी में ऐसा क्या था जो आडवाणी और जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं को परेशान कर रहा था?

बैठक में नहीं पहुंचे LK आडवाणी?

अस्वस्थ पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और नाराज आडवाणी को छोड़कर, सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी, अरुण जेटली, नितिन गडकरी, वेंकैया नायडू और अनंत कुमार सहित 12 सदस्यीय संसदीय बोर्ड के अन्य सभी सदस्य बैठक में मौजूद थे।

PM फेस बनने के बाद क्या बोले मोदी?

प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के बाद, मोदी ने संवाददाताओं से कहा, "मैं भाजपा को विश्वास दिलाता हूं कि 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी की जीत सुनिश्चित करने के लिए मैं कोई कसर नहीं छोड़ूंगा।" उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि वे "सामान्य मानवीय आकांक्षाओं" पर खरे उतरेंगे।

सामने आया LK आडवाणी का लेटर

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मोदी के नाम की घोषणा पार्टी में बेहद कटु माहौल में हुई। एक ओर मोदी के नाम की घोषणा हुई, तो दूसरी ओर आडवाणी का राजनाथ सिंह को लिखा पत्र सामने आया, जिसमें वरिष्ठ नेता ने इस फैसले के संबंध में पार्टी के तौर-तरीकों पर अपनी पीड़ा व्यक्त की।

लालकृष्ण आडवाणी की प्रधानमंत्री बनने की इच्छा कभी छिपी नहीं रही। उन्होंने 2014 के चुनावों में अपनी उम्मीदवारी वापस लेने की बात से कभी इनकार नहीं किया। इसके अलावा, जदयू और अन्य सहयोगी दल भी उनके पक्ष में थे। इन सबके बीच, जिस तेज़ी से मोदी ने उन्हें नजरअंदाज़ करते हुए इस पद के लिए पैरवी की, उससे आडवाणी की उनसे नाराज़गी बढ़ती ही गई।

मोदी ने छोड़ दिया आडवाणी का साथ

लालकृष्ण आडवाणी ने मोदी को ज़रूरत पड़ने पर जीवनदान दिया। लेकिन उन्हें इस बात का अफ़सोस है कि जब उन्हें मोदी के समर्थन की ज़रूरत थी, तब वे चुप रहे। जिन्ना प्रकरण में जब आडवाणी पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गए थे, तब भी मोदी ने एक शब्द नहीं कहा। दूसरी ओर, जब मोदी के सामने आरएसएस के क़रीब रहने और आडवाणी के साथ रहने के बीच चुनने का मौक़ा आया, तो उन्होंने आरएसएस को चुना।

आडवाणी की नाराजगी और त्यागपत्र

इससे पहले 2013 में, नरेंद्र मोदी को भाजपा की चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाए जाने से नाराज़ होकर आडवाणी ने 10 जून को पार्टी के सभी महत्वपूर्ण पदों से इस्तीफा दे दिया था। आडवाणी ने कहा था कि भाजपा अब वह आदर्शवादी पार्टी नहीं रही जिसकी नींव श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीन दयाल उपाध्याय, नानाजी देशमुख और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं ने रखी थी।

आडवाणी अस्त और 'मोदी का उदय'

वरिष्ठ पार्टी नेता लालकृष्ण आडवाणी के कड़े विरोध को नज़रअंदाज़ करते हुए, 13 सितंबर 2013 को भाजपा ने आखिरकार नरेंद्र मोदी को 2014 के आम चुनावों के लिए अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। इसके साथ ही, यह पार्टी में मोदी के उदय और आडवाणी के राजनीतिक पतन की घोषणा बन गई।

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