History of Hindi Journalism: हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर भारतीय मीडिया के बदलते स्वरूप पर लेखक डॉ. विनय कुमार वर्मा ने एक लेख लिखा है। डॉ वर्मा के अनुसार पत्रकारिता, जो कभी सामाजिक चेतना की मशाल और स्वाधीनता आंदोलन का प्रमुख औजार थी, आज तकनीक और बाजार के प्रभाव में अपने मूल धर्म से भटकती नजर आ रही है।
भारतीय हिंदी पत्रकारिता का उदय 30 मई 1826 को पंडित जुगल किशोर शुक्ल द्वारा संपादित “उदंत मार्तंड” से हुआ। उस दौर में पत्रकारिता एक 'तपस्या' और 'मिशन' थी, जहां संपादक जेल जाने और आर्थिक संकट झेलने के बावजूद सत्ता से निर्भीक सवाल पूछते थे। शब्दों का वजन होता था और समाचार केवल सूचना न होकर समाज में विचार पैदा करने का माध्यम थे।
डॉ. विनय कुमार वर्मा के अनुसार समय के साथ पत्रकारिता 'मिशन' से 'प्रोफेशन' में तब्दील हो गई। आधुनिक मशीनों और विज्ञापनों ने इसे गति और व्यापकता तो दी, लेकिन टीआरपी और सर्कुलेशन की दौड़ में मानवीय संवेदनाएं पीछे छूट गईं। खबरें अब 'विचार' के बजाय एक 'उत्पाद' बन गई हैं, जिससे समाज का नैतिक प्रहरी कमजोर हुआ है। डॉ विनय कहते हैं- 'आज आवश्यकता केवल तकनीक की नहीं, विवेक की है। समाज को मीडिया साक्षरता सीखनी होगी। लोगों को समझना होगा कि हर वायरल वीडियो सत्य नहीं होता। हर जोर से बोली गई बात सही नहीं होती। हर ब्रेकिंग न्यूज विश्वसनीय नहीं होती। पत्रकारिता का भविष्य केवल पत्रकारों पर नहीं, पाठकों और दर्शकों की समझ पर भी निर्भर करेगा। जब समाज सस्ती सनसनी को अस्वीकार करेगा, तभी गंभीर पत्रकारिता को शक्ति मिलेगी।'
सोशल मीडिया ने सूचना के प्रसार को लोकतांत्रिक बनाया है, लेकिन साथ ही 'सूचना की अराजकता' भी पैदा कर दी है। संस्थागत पत्रकारिता और डिजिटल मंचों के बीच का अंतर स्पष्ट करते हुए लेखक बताते हैं। बड़े चैनलों और अखबारों में तथ्य जांचने और कानूनी पहलुओं पर विचार करने की एक प्रक्रिया होती है।
डॉ. विनय कुमार वर्मा लिखते हैं- 'आज जब खबरों का शोर चारों ओर फैला हुआ है, तब सबसे बड़ी आवश्यकता है सत्य की धीमी लेकिन विश्वसनीय आवाज को बचाए रखने की। क्योंकि सभ्यताएं केवल तकनीक से नहीं बचतीं, वे सत्य से बचती हैं। और पत्रकारिता यदि सत्य से कट गई, तो वह केवल मनोरंजन का उद्योग बनकर रह जाएगी। तब शायद अखबार छपते रहेंगे, चैनल चलते रहेंगे, वीडियो वायरल होते रहेंगे, लेकिन समाज के भीतर वह भरोसा मर जाएगा जो किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी होता है। पत्रकारिता का भविष्य मशीनों से नहीं, मनुष्यता से तय होगा। कैमरे बदलते रहेंगे, प्लेटफॉर्म बदलते रहेंगे, लेकिन एक सच्चे पत्रकार की पहचान हमेशा वही रहेगी- जो भीड़ के शोर में भी सत्य की आवाज सुन सके।'
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डॉ वर्मा की मानें तो सोशल मीडिया पर व्यक्ति स्वयं रिपोर्टर, संपादक और न्यायाधीश बन बैठा है, जहां अक्सर बिना किसी भाषाई प्रशिक्षण या नैतिकता के 'सनसनी' परोसी जा रही है। आज मानवीय त्रासदी और घायलों को भी केवल 'कंटेंट' और 'व्यूज' के नजरिए से देखा जा रहा है, जो पत्रकारिता की आत्मा के विरुद्ध है।
ये लेखक डॉ. विनय कुमार वर्मा के निजी विचार हैं।