पूर्व IAF चीफ बीएस धनोआ  (सोर्स- सोशल मीडिया)
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परिवार से विरासत में मिला साहस, कारगिल युद्ध में पाक की उड़ाई थी नींद, जानें पूर्व IAF चीफ BS धनोआ की कहानी

BS Dhanoa 69th Birthday: पूर्व वायुसेना प्रमुख बीएस धनोआ ने कारगिल युद्ध में गोल्डन एरो स्क्वाड्रन का नेतृत्व किया और बालाकोट अभियान के दौरान वायुसेना की कमान संभालते हुए साहसिक नेतृत्व दिखाया।

अक्षय साहू

Former IAF Chief BS Dhanoa Birthday Special: भारतीय वायुसेना के पूर्व प्रमुख एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ का नाम उन अधिकारियों में लिया जाता है, जिन्होंने अपने लंबे सैन्य करियर में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। लड़ाकू पायलट के रूप में शुरुआत करने वाले धनोआ ने 1999 के कारगिल युद्ध में एक स्क्वाड्रन का नेतृत्व किया और बाद में भारतीय वायुसेना के सर्वोच्च पद तक पहुंचे। उनकी कहानी सिर्फ एक सैन्य अधिकारी के पद और उपलब्धियों की कहानी नहीं है। यह कठिन परिस्थितियों में नेतृत्व, साहस और अपने साथियों पर भरोसा रखने की कहानी भी है।

विरासत में मिली थी जांबाजी

धनोआ का जन्म 7 सितंबर 1957 को  झारखंड के देवघर में सुखदेव कौर और सोरेन सिंह के घर एक जाट सिख परिवार में हुआ था। उनका पैतृक गांव चंडीगढ़ और मोहाली के पास पंजाब राज्य में घरुआन है। धनोआ के पिता, एक आईएएस अधिकारी थे, जिन्होंने 1980 के दशक के दौरान पंजाब और बिहार सरकारों के मुख्य सचिव के रूप में और बाद में पंजाब राज्य के राज्यपाल के सलाहकार और भारत के चुनाव आयुक्त के रूप में कार्य किया। वहीं, उनके दादा कैप्टन संत सिंह द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश भारतीय सेना के कप्तान के रूप में लड़ाई लड़ी थी।

बीएस धनोआ ने अपनी शुरुआती पढ़ाई रांची के सेंट जेवियर स्कूल में पढ़ाई की। इसके बाद वो आगे की पढ़ाई के लिए मसूरी के सेंट जॉर्ज कॉलेज चले गए और फिर वे देहरादून के राष्ट्रीय भारतीय सैन्य कॉलेज में शामिल हुए और बाद में पुणे की राष्ट्रीय रक्षा अकादमी से स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

एयरफोर्स अधिकारियों के साथ बीएस धनोआ

लड़ाकू पायलट के रूप में शुरुआत

बीएस धनोआ ने जून 1978 में भारतीय वायुसेना की फाइटर ब्रांच में कमीशन हासिल किया। अपने करियर के दौरान उन्होंने मिग-21, जगुआर, मिग-29 और सुखोई-30 एमकेआई जैसे कई लड़ाकू विमानों को उड़ाया। वह एक प्रशिक्षित फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर भी रहे। यानी उनका काम सिर्फ खुद विमान उड़ाना नहीं था, बल्कि दूसरे पायलटों को भी बेहतर तरीके से उड़ान भरने के लिए तैयार करना था।

1999 में जब कारगिल युद्ध शुरू हुआ, तब धनोआ भारतीय वायुसेना की 17वीं स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर थे। इस स्क्वाड्रन को 'गोल्डन एरो' के नाम से जाना जाता है और यह मिग-21 विमानों का संचालन करती थी।

धनोआ ने फाइटर पायलट के रूप में शुरू किया था सफर

ऑपरेशन सफेद सागर में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

कारगिल युद्ध भारतीय सेना और वायुसेना के लिए बेहद कठिन चुनौती था। ऊंचे पहाड़, खराब मौसम, कम दृश्यता और ऊंचाई पर विमान और हथियारों के संचालन की मुश्किलों ने इस अभियान को और चुनौतीपूर्ण बना दिया था। भारतीय वायुसेना ने इस दौरान ऑपरेशन सफेद सागर के तहत सेना को हवाई मदद दी। गोल्डन एरो स्क्वाड्रन भी इस अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा थी।

धनोआ और उनकी टीम को ऐसे इलाके में काम करना था, जहां छोटी-सी गलती भी भारी पड़ सकती थी। इन मुश्किल परिस्थितियों में स्क्वाड्रन ने अपनी रणनीति और काम करने के तरीकों में बदलाव किए। स्क्वाड्रन ने ऊंचाई वाले इलाके में रात के समय बमबारी करने के नए तरीके विकसित किए। उतनी ऊंचाई पर उससे पहले वैसे हमले उनसे पहले दुनिया की किसी वायुसेना ने नहीं किया था। 

धनोआ के गोल्डन एरो स्क्वाड्रन ने कारगिल युद्ध निभाई थी अहम भूमिका

कारगिल युद्ध के लिए मिला युद्ध सेवा पदक

धनोआ ने बाद में कारगिल के दिनों को याद करते हुए कहा था कि मई 1999 में युद्ध की स्थिति उनके लिए भी अचानक आई थी। जब उनकी स्क्वाड्रन को आगे बढ़ने के लिए कहा गया, तब उन्हें शुरू में अंदाजा नहीं था कि वे युद्ध का हिस्सा बनने जा रहे हैं।

21 मई के आसपास उन्हें महसूस हुआ कि स्थिति गंभीर हो सकती है। उन्होंने यह भी याद किया कि 1971 के बाद भारतीय वायुसेना पहली बार बड़े युद्ध में अपने हथियारों का इस्तेमाल करने जा रही थी। कारगिल युद्ध में उनकी भूमिका के लिए धनोआ को युद्ध सेवा पदक और वायु सेना पदक से सम्मानित किया गया। उनकी कमान वाली गोल्डन एरो स्क्वाड्रन को बाद में पश्चिमी वायु कमान की सर्वश्रेष्ठ लड़ाकू स्क्वाड्रन भी चुना गया।

कारगिल के बाद भी जारी रहा सफर

धनोआ की कहानी कारगिल युद्ध के साथ खत्म नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने भारतीय वायुसेना में कई महत्वपूर्ण कमान और परिचालन जिम्मेदारियां संभालीं। उन्होंने वायुसेना मुख्यालय के साथ-साथ पश्चिमी और पूर्वी वायु कमानों में भी वरिष्ठ पदों पर काम किया। उनके अनुभव और नेतृत्व क्षमता ने उन्हें धीरे-धीरे वायुसेना के शीर्ष पद तक पहुंचाया।

दिसंबर 2016 में बीएस धनोआ भारतीय वायुसेना के प्रमुख बने। उन्होंने सितंबर 2019 तक इस पद की जिम्मेदारी संभाली। उनके कार्यकाल के दौरान भारतीय वायुसेना ने कई महत्वपूर्ण परिचालन चुनौतियों का सामना किया।

धनोआ के नेतृत्व में हुआ बालाकोट ऑपरेश

फरवरी 2019 में बालाकोट हवाई अभियान के दौरान भी वे वायुसेना प्रमुख थे। उनके नेतृत्व में वायुसेना ने अपनी ऑपरेशनल तैयारियों, प्रशिक्षण और युद्ध क्षमता को मजबूत करने पर जोर दिया। अपने लंबे करियर में पूर्व एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ ने कई मुश्किलों का सामना किया। फिर चाहे वो कारगिल युद्ध में दुश्मन पर हवाई हमले करने के लिए नई तकनीक का इजाद करना हो या फिर 2019 में बालाकोट हमले के बाद यह सुनिश्चित करना हो कि उनका हर सैनिक सुरक्षित लौटकर अपने घर आए। बीएस धनोआ ने हर बार सफल रहे भारतीय वायुसेना का नाम रोशन करते रहे।  

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